हिंदी अनिवार्य करने संबंधी याचिका की सुनवाई से इंकार

हिन्दी भाषा को कक्षा एक से कक्षा आठ तक अनिवार्य करने के लिए दिशानिर्देश देने की मांग करनेवाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी नीति बनाना सरकार का काम है कोर्ट का नहीं।

कोर्ट ने कहा कि कल कोई संस्कृत या पंजाबी के लिए ऐसी ही मांग रखेगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय से कहा कहा कि आप भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं। आप सरकार से बात करें। इसके बाद अश्विनी उपाध्याय ने याचिका वापस ले लिया।

याचिका में कहा गया था कि उच्च न्यायपालिकाओं और लोकसेवा के सदस्य जिन्होंने अपनी शिक्षा केवल क्षेत्रीय भाषाओं में पूरी की है और जो न हिन्दी बोल सकते हैं और न पढ़ सकते हैं, जब उनका तबादला दूसरे राज्यों में होता है तो वे बड़ा असहज महसूस करते हैं। उन्हें दूसरे राज्य के आम आदमी से बात करने में बड़ी परेशानी होती है क्योंकि वे दूसरे राज्य की भाषा नहीं जानते हैं।

याचिका में कहा गया था कि अगर कक्षा एक से कक्षा आठ तक हिन्दी भाषा को अनिवार्य कर दिया जाए तो इस समस्या से निपटने में मदद मिलेगी। अगर कक्षा एक से कक्षा आठ तक हिन्दी भाषा को अनिवार्य बना दिया जाएगा तो देश के नागरिकों को आपस में बात करने परेशानी नहीं होगी। इससे भाईचारा, एकता और राष्ट्रीय अखंडता को बढ़ावा मिलेगा।

याचिका में कहा गया था कि संविधान का निर्माण करते समय कहा गया था कि इसे लागू करने के 15 साल तक अंग्रेजी ही कार्यपालिका, न्यायपालिका और न्यायिक कार्यों में इस्तेमाल की जाएगी, लेकिन ये आज तक इस्तेमाल हो रही है।

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