वॉट्सऐप, फेसबुक, स्काइप, वीचैट और गूगल टॉक हेतु नियम-कायदे

वॉट्सऐप, फेसबुक, स्काइपकेंद्र सरकार ने 5 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में जानकारी दी कि वह जल्द ही वॉट्सऐप, फेसबुक, स्काइप, वीचैट और गूगल टॉक जैसी सर्विसेज के नियमन हेतु नियम-कायदे बनाने जा रही है. ये नियम वैसे ही होंगे, जैसा कि टेलिकॉम कंपनियों के लिए होते हैं.

दूरसंचार विभाग की ओर से दलील दी गई थी कि ये सोशल नेटवर्क, अपने उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए टेलिकॉम सेवा देने वालों के नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, ऐप आधारित सेवाएं देते हैं और संदेश व फोन करने की सुविधा देते हैं लेकिन  इनके नियंत्रण और नियमन के लिए कोई नियम-कानून नहीं है.

इसके पहले वॉट्सऐप ने एक याचिका के विरोध में अपना जवाब सुप्रीम कोर्ट को सौंपा था. याचिकाकर्ता कर्मण्य सिंह सरीन ने वॉट्सऐप की निजता नीति पर सवाल उठाए थे. इसके जवाब में वॉट्सऐप ने कहा था कि ये सेवाएं कुछ हद तक सूचना तकनीक एक्ट 2000 के प्रावधान के तहत नियंत्रित होती हैं और इन पर वही नियम-कायदे लागू नहीं होते जो कि पारंपरिक ध्वनि  और सन्देश सेवा उपलब्ध कराने वाले टेलिकॉम सेवा देने वाले पर होता है.

इन सेवायों की निजता नीति पर याचिकाकर्ता की ओर से कड़े सवाल उठाने और बाद में केंद्र सरकार के भी इससे सहमत नजर आने के बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को भेज दिया है. अदालत  ने पांच सदस्यीय बेंच के सामने इस मामले की सुनवाई की तारीख 18 अप्रैल तय की है.

वॉट्सऐप जैसी अन्य सेवायों की ओर से कहा गया कि पूरे विवाद में निजता का कोई मुद्दा ही नहीं है जैसा कि याचिकाकर्ता का दावा है.  वकीलों के मुताबिक, यह उपभोक्ता और ऐसी स्वयें देने वालों के बीच का मामला है.

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि वॉट्सऐप पर निजी संदेशों के मामले में निजता की कमी निजता का हनन है. याचिकाकर्ता के मुताबिक, यह मूल रूप से संविधान के आर्टिकल 21 के तहत राइट टु लाइफ से जुड़ा हुआ मामला है.

इससे पहले, चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड की पीठ ने कहा कि जब मामला व्यापक तरीके से जनसरोकार से जुड़ा हो तो वह एक संवैधानिक मुद्दा बन जाता है.

इस मामले में याचिकाकर्ता ने कहा था कि फेसबुक-वॉट्सऐप पर डेटा सुरक्षित नहीं है, जो संविधान के आर्टिकल 21 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने कहा था कि वॉट्सऐप और फेसबुक को टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स की तरह देखना जाना चाहिए, जिन्हें ग्राहकों की जासूसी करने पर बंद किया जा सकता है/

याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि वॉट्सऐप और फेसबुक पर 15 करोड़ 70 लाख उपभोक्ता हैं, ऐसे में उन्हें उपलब्ध करवाई जाने वाली सेवा को जन सुविधा सेवा के तौर पर देखा जाना चाहिए. अगर इसे एक बार पब्लिक यूटिविटी सर्विस की श्रेणी में डाल दिया जाता है तो सरकार को इसमें आने वाले डाटा को संरक्षित करना चाहिए.

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