हत्यारों को जमानत: मृतक की ग़लती कि वो दूसरे धर्म का था

2014 में पुणे में मोहसिन शेख की हत्या के सिलसिले में बांबे हाईकोर्ट ने हत्या के 3 आरोपियों को दे दी है.

2 जून 2014 को पुणे में हिन्दू राष्ट्र सेना ने प्रतिरोध सभा की थी. तब फेसबुक पर किसी ने शिवाजी महाराज की और शिव सेना के संस्थापक नेता दिवंगत बाल ठाकरे की छवि के साथ किसी ने छेड़छाड़ की, और उसी के ख़िलाफ़ हिन्दू राष्ट्र सेना ने विरोध किया था.

फेसबुक पर किसने ये पोस्ट किया था, किसी को पता नहीं लेकिन उस बैठक से लौटते हुए आरोपियों ने कथित रूप से हॉकी स्टिक और छड़ से मोहसिन और रियाज़ शेख पर हमला कर दिया. दोनों ही आईटी इंजीनियर थे और रात का खाना खाने जा रहे थे. रियाज़ तो बच निकला लेकिन मोहसिन की हत्या हो गई.

इसी मामले में ये तीन आरोपी पकड़े गए और इन्हें ज़मानत देते वक्त जो लिखा गया है वो इस तरह है- धनंजय देसाई के भड़काऊ भाषण के ट्रांसक्रिप्ट से पता चलता है कि उसने धार्मिक भेदभाव की भावना को भड़काया. आवेदक या आरोपियों की निर्दोष मोहिसन के ख़िलाफ़ निजी शत्रुता जैसी कोई और मंशा नहीं थी. मृतक की यही ग़लती कि वो अन्य धर्म का है. मैं इस बात को आरोपी के हक में मानती हूं. यही नहीं आरोपी या आवेदक का कोई आपराधिक अतीत नहीं है. ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म के नाम उन्हें उकसाया गया और उन्होंने हत्या कर दी.

विजय गंभीरे, रंजीत यादव और अजय लालगे आरोपियों के नाम हैं. इन्हें पहले सेशन कोर्ट से ज़मानत नहीं मिली थी तब ये हाई कोर्ट गए और ज़मानत मिल गई.

इस आदेश को लेकर सवाल उठ रहे हैं. आदेश का संदर्भ और आदेश की भाषा दोनों ही कोर्ट का फैसला नहीं है बल्कि ज़मानत का आदेश है.

आदेश में जज साहिबा ने ज़मानत की शर्तें भी लिखी हैं कि ये लोग किसी भी तरीके से हिन्दू राष्ट्र सेना जैसे धार्मिक संगठन से खुद को नहीं जोड़ेंगे. आरोपी उस इलाके में नहीं जाएंगे जहां घटना घटी थी.

ज़मानत के लिए इतना कारण काफी है कि वे भड़काए गए थे. आदेश में लिखा है कि मृतक की ग़लती यह थी कि वो दूसरे धर्म का था.

इस संबंध में एक अखबार द्वारा समाचार देते  यह लिखा गया कि “इस ज़मानत के कारणों में जो बात लिखी है यह वही कारण है जो एक नागरिक से उसके तमाम संवैधानिक कवच छीन लेते हैं.”

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