अंतरजातीय विवाह से बच्चे को मिलेगा आरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने 18 जनवरी को कहा कि अंतरजातीय विवाह से पैदा हुई संतानों को महज इस आधार पर आरक्षण देने से मना नहीं किया जा सकता कि अभिभावकों में से एक ऊंची जाति से संबंधित है। जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की पीठ ने यह फैसला रमेशभाई दाभाई नायक की अपील पर दिया है जिसमें गुजरात हाईकोर्ट ने उन्हें अनुसूचित जनजाति का आरक्षण देने से मना कर दिया था क्योंकि उनके पिता क्षत्रिय जाति से संबंधित हैं।

पीठ ने कहा, अंतरजातीय विवाह या आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच विवाह से जन्में बच्चे का जाति निर्धारण प्रत्येक मामले में अंतर्निहित तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि अंतरजातीय विवाह या आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच विवाह में एक पूर्व धारणा हो सकती है कि बच्चे को पिता की जाति मिले ।

उन्होंने कहा कि यह पूर्व धारणा उस मामले में और मजबूत हो सकती है जब आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच विवाह में पति उच्च जाति का को लेकिन यह पूर्व धारणा किसी भी तरीके से निर्णायक नहीं हो सकता और ऐसे विवाह से जन्मा बच्चा यह सबूत दिखा सकता है उसकी परवरिश अनुसूचित जाति जनजाति से संबंध रखने वाली माता ने की।

फैसले में जस्टिस आलम ने कहा कि एक जनजाति और सामान्य वर्ग के लोगों के विवाह में बच्चे की जाति का निर्धारण पिता की जाति के आधार पर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह कानून अंतरजातीय विवाह की अनुमति नहीं देता।

ऐसे में यह विचार करने की जरूरत है कि ऐसे मामलों में महिला की जाति में परिवर्तन कर उसके पति की जाति कर देने में कहां तक इस कानून को माना जाए। साथ ही अनुसूचित जाति के विपरीत जनजातियों से विवाह के मामले में हिंदू विवाह कानून तभी लागू होगा जबकि संविधान के लागू होने के पहले से ही जनजाति हिंदू हो।

कोर्ट ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट इन तथ्यों की सही पड़ताल करने में विफल रहा है। साथ ही इस तथ्य पर भी ध्यान नहीं दिया गया है कि याचिकाकर्ता खुद भी नायक है और उसकी और उसके भाई-बहनों के विवाह भी नायक जनजाति में हुए हैं। इस आधार पर याचिकाकर्ता अनुसूचित जनजाति का आरक्षण पाने का हकदार है।

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