अब देशभर में कहीं भी वकालत कर सकेंगे वकील

केंद्र सरकार के विधि मंत्रालय ने वकीलों को, अधिवक्ता अधिनियम के 50 वर्ष पूरे होने पर एक तोहफा दिया है। इसके अनुसार वकीलों द्वारा स्थान विशेष पर वकालत करने की पाबंदी हट गई है। अब वे जम्मूकश्मीर को छोड़कर देशभर में कहीं भी वकालत कर सकेंगे। केंद्र ने अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 30 को लागू करने की स्वीकृति दे दी है। इसे राजपत्र प्रकाशन के पश्चात से लागू माना जाएगा।

वकीलों को अब तक स्थान और अदालत विशेष के अलावा पैरवी करने के लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती थी। दो दिन पूर्व केंद्रीय विधि मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के बाद वकीलों को अनुमति वाली प्रक्रिया से मुक्ति मिल जाएगी।

मंत्रालय के आदेश में अधिवक्ता अधिनियम-1961 की धारा 30 लागू करने की बात कही गई है। इस धारा के तहत वकीलों को किसी भी न्यायालय में जाने का अधिकार प्राप्त होगा।

यह अधिकार अधिनियम में दर्शाया गया था, मगर धारा लागू नहीं की गई थी। इसी कारण वकीलों को किसी भी न्यायालय में पैरवी करने या फैमिली कोर्ट या ट्रिब्यूनल, ज्यूवनाइल कोर्ट में जाने की पाबंदी थी। इस सम्बंध में केरल की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया था, जिसके बाद विधि मंत्रालय ने इसे लागू करने की स्वीकृति दे दी। अब वे देश के किसी भी स्थान (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) और किसी भी अदालत में पैरवी कर पाएंगे।

धारा-30 के लागू न होने के कारण वकीलों को कई जगह पैरवी करने की मनाही थी। मुख्य रूप से फैमिली कोर्ट में मध्यस्थता में वकीलों को दिक्कत होती थी। साथ ही पक्षकारों को उचित न्याय नहीं मिलता था। देशभर में अधिवक्ताओं ने धारा-30 पर लागू कराने के लिए कई बार आंदोलन किया है। 2002-03 में भी संसद घेराव कर उक्त धारा को लागू कराने की अपील की गई थी। कई बार केंद्रीय विधि मंत्रालय को इसे लागू करने का मेमोरंडम दिया गया था।

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4 thoughts on “अब देशभर में कहीं भी वकालत कर सकेंगे वकील”

  1. मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

    दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

    मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

    मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

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  2. CAN ANY ADVOCATE OF LOWER COURT CAN PRACTICE IN SUPREME COURT………………………..\
    VIJAY ARORA

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  3. Can an an advocate having the membership of a particular court practice in a different court permanently .Or now its not necessary to take the membership of any court.

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