सुप्रीम कोर्ट का आदेश: आशिक की आँखें जला दी जाए तेज़ाब डाल कर

ईरान के सुप्रीम कोर्ट ने एक आशिक की आंखों में तेजाब डालने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।

इस मामले में 34 वर्षीय आमिना को एकतरफा प्यार करने वाले माजिद ने उसके इनकार करने के बाद 2004 में चेहरे पर तेजाब फेंक दिया था, जिससे अमिना की आंखों की रोशनी चली गई । आमिना ने माजिद को सबक सिखाने के लिए इस्लामिक कानून के तहत गुजारिश की कि उसकी आंखों में भी तेजाब डाला जाए। जिंदगी में अंधेरा छा जाने के बाद भी आमिना ने हार नहीं मानी। वो माजिद को सबक सिखाना चाहती थी ताकि कोई फिर ऐसी हरकत न कर सके। उसने इस्लामिक कानून के तहत गुजारिश की कि माजिद की आंखों में भी तेजाब डाला जाए। ईरानी कानून के मुताबिक उसने मिलने वाला मुआवजा लेने से इंकार कर दिया और इंसाफ की मांग की, मतलब आंख के बदले आंख।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आमिना की मांग को बर्बर करार देते हुए इसका काफी विरोध किया। आखिरकार आमिना की लड़ाई रंग लाई और नवंबर 2008 में एक अदालत ने माजिद की दोनों आंखों में पांच-पांच बूंद तेजाब डालने का आदेश दे दिया। माजिद ने इसके खिलाफ अपील की थी। लेकिन फरवरी 2009 में ईरान के सुप्रीम कोर्ट ने पुराना फैसला बरकरार रखा।
आंख के बदले आंख लिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार आमिना की जिंदगी को अंधेरे में धकेलने वाले माजिद की दोनों आंखों में पांच-पांच बूंद तेजाब डालकर उन्हें जला दिया जाएगा। फैसले के मुताबिक माजिद को 14 मई को ही यह सजा दी जाने वाली थी, लेकिन इसे आगे की तारीख के लिए टाल दिया गया है।
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6 thoughts on “सुप्रीम कोर्ट का आदेश: आशिक की आँखें जला दी जाए तेज़ाब डाल कर”

  1. अमानवीय तो लगता है । लेकिन उसका कृत्य भी कम अमानवीय नहीं । मानव अधिकार तो सब के लिए समान होने चाहिए ।

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  2. पति द्वारा क्रूरता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव अपने अनुभवों से तैयार पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में दंड संबंधी भा.दं.संहिता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव विधि आयोग में भेज रहा हूँ.जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के दुरुपयोग और उसे रोके जाने और प्रभावी बनाए जाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए गए हैं. अगर आपने भी अपने आस-पास देखा हो या आप या आपने अपने किसी रिश्तेदार को महिलाओं के हितों में बनाये कानूनों के दुरूपयोग पर परेशान देखकर कोई मन में इन कानून लेकर बदलाव हेतु कोई सुझाव आया हो तब आप भी बताये.

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  3. दराल सा से सहमत…कम से कम इसे देख आगे कोई ऐसी हिम्मत न करे.

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  4. क्रिमिनल लॉ में मानवाधिकार और दया की गुंजाइश तो नहीं है। फिर भी कोर्ट कुछ परिस्थितियों में ही छूट देते हैं। परंतु अरबी कानून में तो सख़्त सज़ा का ही प्रावधान जिसके चलते इस प्रकार के सामाजिक अपराध कम ही होते हैं। अतः उस नारी का जीवन नारकीय बनाने की यह सज़ा माकूल है ताकि वह सारी ज़िंदगी यह पश्चाताप करे और दूसरों पर डोमिनो इफ़ेक्ट हो।

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  5. सच कहा जाये तो मानवाधिकार वाली बात सिर्फ और सिर्फ दिखावा है, हकिक़त में ऐसे गुनाहगारों को ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए!कुछ मामलों में इस्लामी कानून काफी सटीक बैठते हैं!

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  6. लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

    मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

    कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

    मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

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