अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला

अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के तीनों जजों ने अलग अलग फैसला दे दिया है। तीनों फैसलों की घोषणा के बारे में मीडिया को संक्षिप्त जानकारी दी जा चुकी है। फैसलों को अदालत की वेबसाइट पर भी लगाया जा रहा है।

अयोध्या विवाद के 60 साल से चल रहे मुक़दमे के फैसले पर तत्काल स्टे की तैयारी भी कर ली गई है। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट से निकल कर देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंच जाएगा। पक्षकारों ने अपने अपने वकालतनामे और दूसरे दस्तावेज शीर्ष अदालत में जमा करा दिए हैं ताकि साढ़े तीन बजे फैसला आने के तुरंत बाद उसे विशेष उल्लेख यानी मेंशन कर इस पर सुनवाई कराई जा सके। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की सत्यापित प्रति की औपचारिकता के बिना ही इस पर विशेष परिस्थितियों में सुनवाई करेगा। हाई कोर्ट ने पहले ही घोषणा कर रखी है कि तुरंत ही फैसले का सार, वेबसाइट पर डाल दिया जाएगा। यह भी माना जा रहा है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए स्वयं कह दे। इस बार में कानूनविदों का कहना है कि इस तरह के उदहारण पहले भी हो चुके हैं। आम तौर पर किसी भी फैसले की सत्यापित प्रतिलिपि हाई कोर्ट से तीन दिन में मिलती है। उसी के आधार पर वादी अपील करता है।

आज इलाहाबाद हाई कोर्ट की जिस विशेष बेंच ने फैसला सुनाया उसमे जस्टिस एसयू खान, जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस धर्मवीर शर्मा हैं। जस्टिस खान अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से विधि स्नातक हैं। उन्होंने अलीगढ़ सिविल कोर्ट से प्रैक्टिस शुरू की। वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में दिसंबर 2002 में जज बने।

दूसरे जज 52 वर्षीय जस्टिस अग्रवाल 5 अक्तूबर 2005 में हाई कोर्ट के जज बने। इससे पहले वह उत्तर प्रदेश सरकार के अडिशनल एडवोकेट जनरल भी रहे हैं। मेरठ यूनिवर्सिटी से विधि स्नातक जस्टिस अग्रवाल टैक्सेशन के अच्छे वकीलों में शुमार होते थे।

तीसरे जज 62 वर्षीय जस्टिस धरमवीर शर्मा 20 अक्तूबर 2005 में हाई कोर्ट के जज बने. वह हाई कोर्ट में जज बनने से पहले उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में रह चुके हैं। वह सरकार के प्रिंसिपल सेक्रट्री (लॉ) भी रह चुके हैं।

यह भी अजीब इत्तेफाक है कि उम्र में सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस शर्मा जजों में सबसे कनिष्ट हैं।
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अयोध्या मामले पर ऐतिहासिक फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित भूमि को रामजन्मभूमि माना है और कहा है कि मूर्ति अपने मौजूदा स्थान से नहीं हटाई जाएगी. साथ ही गुंबद के बाहर की ज़मीन मुसलमान गुटों, निर्मोही अखाड़ा और राम जन्मभूमि न्यास के बीच बंटेगी

फैसले के बिंदू:
सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया गया है।
यह भी साबित हो गया है कि मंदिर तोड़कर बनाई गई थी मस्जिद।
जहां रामलला विराजमान हैं वही राम जन्मभूमि है।
जमीन 3 भागों में बांटा जाएगा। जहां रामलला विराजमान है वह जमीन मंदिर को दी जाएगी। एक तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड को। एक तिहाई निर्मोही अखाड़ा दिया जाएगा। इसमें राम चबूतरा और सीता रसोई भी शामिल है।
जहां रामलला विराजमान हैं वह स्थान मंदिर को।

(संबंधित अपडेट क्रमश: यहाँ उपलब्ध होंगें)

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2 thoughts on “अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला”

  1. श्रीराम जय राम – जय जय राम

    बधाई हो
    बधाई हो

    दोनों पक्षों को शुभकामनाएं.

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  2. जय श्रीराम
    ab mandir nirman karne ki phel kendra sarkar ko visesh kanoon pass kar krni chaiya jasi somnath mandir mai hua tha

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