लॉ-फर्में देश में बहुत से न्यायाधिकरण बनाने के पक्ष में नहीं

लॉ फर्म भसीन एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर ललित भसीन ने कहा कि बहुत से न्यायाधिकरण बनाने से देश की न्यायिक व्यवस्था कमजोर होगी। किसी भी क्षेत्र में न्यायाधिकरण बनाने के स्थान पर मौजूदा व्यवस्था को मजबूत बनाना चाहिए और कानूनों को तर्कसंगत किया जाना चाहिए। लगभग सभी कानूनी फर्में इसी पक्ष में हैं। कानूनी फर्मों ने अपनी राय सरकार द्वारा आर्थिक अपराध और विवादों से निबटने के लिए विशेष पैनल और अदालतों का गठन करने पर विचार करने की खबर पर जाहिर की है। इस तरह सरकार सामान्य और विशेष मामलों को अलग-अलग करना चाहती है। 
कानून मंत्रालय सरकार के इस प्रस्ताव चर्चा कर के उसे अंतिम रूप देने की तैयारी में है। इस के लिए कानून के मौजूदा ढांचे में बदलाव करना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री की व्यापार और उद्योग परिषद की सलाह पर ऐसा किया जा रहा है। परिषद ने विवादों के निबटारे के लिए विशेष व्यवस्था करने को कहा था।
26 मई को पुनर्गठित परिषद की पहली बैठक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई थी जिस में देश के सभी नामी गिरामी उद्योगपति रतन टाटा, मुकेश अंबानी, आर पी गोयनका, अजीम प्रेमजी, सुनील मित्तल, दीपक पारेख, राहुल बजाज, एन आर नारायणमूर्ति और कुमारमंगलम बिड़ला आदि शामिल हुए। एक अधिकारी ने बताया कि ये विशेष अदालतें अपने क्षेत्रों के मामलों को देखेंगी और इनका फैसला अंतिम होगा। कानून के मुताबिक, इनके फैसले के खिलाफ सिर्फ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की जा सकेगी। 
वास्तविकता यह है कि अधीनस्थ और उच्च न्यायालयों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं और आर्थिक मामलों का जल्दी हल न होना उद्योगपतियों के हितों के विपरीत है इसी वजह से कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली भी ऐसी विशेष अदालतों के पक्ष में हैं। उनके अनुसार संसद को नया कानून तभी बनाना चाहिए, जब यह तय कर लिया जाए कि इन अदालतों पर कितना बोझ पड़ेगा। आर्थिक मामलों की सुनवाई अभी नियमित अदालतों में होती है।  सरकारी अनुमानों के अनुसार, देश भर की अदालतों में अभी 3 करोड़ मामले लंबित हैं। इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।
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2 thoughts on “लॉ-फर्में देश में बहुत से न्यायाधिकरण बनाने के पक्ष में नहीं”

  1. जब तक भ्रष्ट मंत्रियों ,भ्रष्ट जजों और भ्रष्ट वकीलों का गठजोड़ रहेगा न्याय किसी भी हाल में नहीं होगा ,ज्यादातर जजों ने जज की मर्यादा को कलंकित करने का काम किया है और कुछ तो ऐसे भी है जो किसी भी हाल में जज के योग्य नहीं हैं ,ज्यादातर जज आज भ्रष्टाचार के खेल में शामिल हैं इसलिए अगर जजों पर पैसे के लिए न्याय को अन्याय में बदलने का आरोप लगे तो आरोपी जज की ब्रेनमेपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट जरूरी कर दिया जाय और वह भी इमानदार समाजसेवकों के सामने तब जाकर इनको थोडा डर होगा अभी तो जज सिर्फ अपनी मनमानी कर रहें हैं | सच्चे न्याय के लिए किसी को भी किसी प्रकार के टेस्ट से गुजरने में परहेज नहीं करना चाहिए जो परहेज करता है निश्चय ही वह न्याय और जज के योग्य नहीं है ,वह एक गंभीर अपराधी है | इस प्रकार का प्रयोग भोपाल गैस कांड का फैसला देने वाले जज से शुरू किया जाना चाहिए | इन लोगों ने न्याय को अपने बाप की जागीर समझ लिया है और ऊपर से गलत को गलत कह भी नहीं सकते वह रे न्याय ?

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  2. लॉफर्मों का पक्ष भी पढ़ लिया.

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