हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित करने वाला कोई आदेश नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने भी खाली हाथ लौटाया हिन्दी को

देश का संविधान लागू हुए 60 साल हो गए लेकिन देश की राष्ट्रभाषा क्या हो यह अभी तक तय नहीं। भले ही संविधान का अनुच्छेद 343 हिन्दी को ‘देश की राजभाषा’ घोषित करता हो लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि ऐसा कोई प्रावधान या आदेश रिकार्ड पर मौजूद नहीं है, जिसमें हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया हो यह सिर्फ इसी देश में हो सकता है कि देश की राष्ट्रभाषा ‘हिंदी’ को अपना हक मांगने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े। यही नहीं, वह एक अदालत में मामला हार जाए और फिर न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार करे।

दरअसल, राष्ट्रभाषा हिंदी के एक पैरोकार बड़े जोश के साथ सुप्रीम कोर्ट आए थे हिंदी को न्याय दिलाने। लेकिन 12 अप्रैल को सिर्फ उन्हें ही नहीं, उनके साथ ‘हिंदी’ को भी अदालत ने खाली हाथ लौटा दिया। गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ लगाई गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि वे अपनी आपत्ति हाईकोर्ट के सामने ही दर्ज कराएं।

मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा व न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की पीठ ने राष्ट्रभाषा हिंदी के संबंध में याचिका लगाने वाले वकील मनोज कुमार मिश्र की याचिका को नकार दिया। मिश्रा ने अदालत को बताया कि वह गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के उस अंश को चुनौती देना चाहते हैं, जिसमें अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 343 को नजरअंदाज करते हुए कह दिया है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के संबंध में रिकार्ड पर कोई आदेश या प्रावधान मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के पूरे आदेश पर ऐतराज नहीं है वे सिर्फ हिंदी पर टिप्पणी करने वाले हिस्से के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट आए हैं।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर आपत्ति नहीं है, तो उन्होंने अपनी आपत्ति हाई कोर्ट के सामने ही क्यों नहीं जताई? पीठ ने याचिका पर विचार करने से मना करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपनी बात हाईकोर्ट के सामने ही रखें।

इससे पूर्व याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को हाईकोर्ट के फैसले का वह अंश पढ़कर सुनाया, जिस पर उन्हें आपत्ति थी। इसके मुताबिक, सामान्यत: भारत में ज्यादातर लोगों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा की तरह स्वीकार किया है और बहुत से लोग हिंदी बोलते हैं तथा देवनागरी में लिखते हैं लेकिन रिकार्ड पर ऐसा कोई आदेश या प्रावधान मौजूद नहीं है जिसमें हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया हो । इस अंश को न्यायमूर्ति दीपक वर्मा ने भी पढ़ा लेकिन वे और उनके साथ अन्य न्यायाधीश, याचिकाकर्ता की दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए।

मामला यह है कि हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने को आधार मानकर विभिन्न उत्पादों पर जानकारी को हिन्दी में अनिवार्य तौर पर छापे जाने संबंधी एक याचिका गुजरात हाईकोर्ट में लगाई गई थी। इस जनहित याचिका को खारिज करते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने गत 13 जनवरी को अपने फैसले में कहा, सामान्यत: भारत में ज्यादातर लोगों ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा की तरह स्वीकार किया है। बहुत से लोग हिन्दी बोलते हैं और देवनागरी में लिखते हैं लेकिन रिकार्ड पर ऐसा कोई आदेश या प्रावधान मौजूद नहीं है, जिसमें हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया हो।

इस फैसले के खिलाफ श्रीकांत तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है। तिवारी ने अपने वकील मनोज कुमार मिश्र के जरिए दाखिल याचिका में सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट का फैसला निरस्त करने की मांग की है। उन्होंने अदालत से संविधान के अनुच्छेद 343 और 344 की व्याख्या करने का भी अनुरोध किया है। उनका तर्क है कि जब हिन्दीराजभाषामानी गई है तोवहीराष्ट्रभाषाभीहोगी।

उनके मुताबिक, फैसला देते समय हाईकोर्ट ने इस पर विचार नहीं किया कि संविधान सभा के ज्यादातर लोगों का मत था कि राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में राष्ट्रभाषा का उपबंध जरूरी है।

आये देखें कि संविधान का अनुच्छेद 343 क्या कहता है:

  • केन्द्र की शासकीय भाषा हिन्दी होगी जिसकी लिपि देवनागरी होगी। शासकीय उपयोग में भारतीय अंक अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप में ही प्रयोग किए जाएंगे।
  • उपरोक्त उपबंध के अलावा संविधान लागू होने के 15 वर्षों तक अंग्रेजी का इस्तेमाल होता रहेगा जैसे कि संविधान लागू होने से पहले होता रहा है।
  • लेकिन राष्ट्रपति इस अवधि में भी अंग्रेजी के साथ हिन्दी को केन्द्र की शासकीय भाषा के रूप में प्रयोग करने का आदेश दे सकते हैं।
  • अगर संसद चाहे तो कानून के द्वारा 15 वर्ष की समय सीमा के बाद भी अंग्रेजी का उपयोग या देवनागरी में अंकों का उपयोग करने का आदेश दे सकती है।

इसके पहले हिन्दी पर कई बार विवाद की स्थिति बनी है
देखिएगा:
अदालतों की भाषा हिन्दी करने से देश की एकता, अखंडता प्रभावित होगी, बदअमनी का माहौल बनेगा!?
अदालत की सुनवाई हिंदी में भी हो
ऊंची अदालतों में हिंदी मंजूर नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने, हिन्दी में याचिका को, सुनवाई के लिए स्वीकारा
सुप्रीमकोर्ट व हाईकोर्ट के फैसलों को अंग्रेजी की बजाए हिंदी में लिखा जायेगा !?
न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ, कई विवाद और अड़चनें पैदा हो गई
हिंदी में बहस की अनुमति माँगने के लिए दिल्ली के वकीलों ने चलाया ह्स्ताक्षर अभियान
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक वकील को हिन्दी में जि़रह करने की इजाजत दी

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5 thoughts on “हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित करने वाला कोई आदेश नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने भी खाली हाथ लौटाया हिन्दी को”

  1. कभी कभी लगता है कि हमारी न्यायपालिका लकीर की फकीर है। अरे चाहे संविधान में लिखा हो या ना हो जब भारत के ज्यादातर लोग हिन्दी जानते हैं और अघोषित रूप से उसे राष्ट्रभाषा मानते हैं तो उसे कानूनी तौर पर भी राष्ट्रभाषा मान लिया जाना चाहिए। क्योंकि इसी में देशहित है।
    न्यायपालिका एक चीज़ और स्पष्ट करे कि कानून जनता के लिए होता है या जनता कानून के लिए?

    अरर्रे !!! मैं तो भूल गया! भारत में तो अंग्रेजों का कानून लागू है।

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  2. Hindi ka hindustan main apman nishchay hi yah gambhir mamla hai aur suprim court ne aise gambhir mamle ko sunwaie ke liye nahi swikar karke desh ke logon ke bich apni chhwi ko kharab karne ka kam kiya hai.KAM SE KAM SUPRIM COURT KO DESH AUR DESH KI BHAWNAON SE JURE MUDDON PAR AISA RUKH NAHI APNANA CHAHIYE THA.DESH KE LOG SUPRIM COURT KI TARAF NYAY AUR HAR KIMAT PAR NYAY KE LIYE DEKHTE HAIN JISKA SAMMAN SUPRIM COURT KO BHI KARNA CHAHIYE.

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  3. samay ki mang,hindi mein kaam. hindi ke prayog mein sankoch kesa,yeh hamari apni bhasha hai. hindi mein kaam karke, rastra ka samman karie. कभी कभी लगता है कि हमारी न्यायपालिका लकीर की फकीर है। अरे चाहे संविधान में लिखा हो या ना हो जब भारत के ज्यादातर लोग हिन्दी जानते हैं और अघोषित रूप से उसे राष्ट्रभाषा मानते हैं तो उसे कानूनी तौर पर भी राष्ट्रभाषा मान लिया जाना चाहिए। क्योंकि इसी में देशहित है।
    न्यायपालिका एक चीज़ और स्पष्ट करे कि कानून जनता के लिए होता है या जनता कानून के लिए?

    भारत में तो अंग्रेजों का कानून लागू है।
    Hindi ka hindustan main apman nishchay hi yah gambhir mamla hai aur suprim court ne aise gambhir mamle ko sunwaie ke liye nahi swikar karke desh ke logon ke bich apni chhwi ko kharab karne ka kam kiya hai.KAM SE KAM SUPRIM COURT KO DESH AUR DESH KI BHAWNAON SE JURE MUDDON PAR AISA RUKH NAHI APNANA CHAHIYE THA.DESH KE LOG SUPRIM COURT KI TARAF NYAY AUR HAR KIMAT PAR NYAY KE LIYE DEKHTE HAIN JISKA SAMMAN SUPRIM COURT KO BHI KARNA CHAHIYE.

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  4. samay ki mang,hindi mein kaam. hindi ke prayog mein sankoch kesa,yeh hamari apni bhasha hai. hindi mein kaam karke, rastra ka samman karie. कभी कभी लगता है कि हमारी न्यायपालिका लकीर की फकीर है। अरे चाहे संविधान में लिखा हो या ना हो जब भारत के ज्यादातर लोग हिन्दी जानते हैं और अघोषित रूप से उसे राष्ट्रभाषा मानते हैं तो उसे कानूनी तौर पर भी राष्ट्रभाषा मान लिया जाना चाहिए। क्योंकि इसी में देशहित है।
    न्यायपालिका एक चीज़ और स्पष्ट करे कि कानून जनता के लिए होता है या जनता कानून के लिए?
    भारत में तो अंग्रेजों का कानून लागू है।
    Hindi ka hindustan main apman nishchay hi yah gambhir mamla hai aur suprim court ne aise gambhir mamle ko sunwaie ke liye nahi swikar karke desh ke logon ke bich apni chhwi ko kharab karne ka kam kiya hai.KAM SE KAM SUPRIM COURT KO DESH AUR DESH KI BHAWNAON SE JURE MUDDON PAR AISA RUKH NAHI APNANA CHAHIYE THA.DESH KE LOG SUPRIM COURT KI TARAF NYAY AUR HAR KIMAT PAR NYAY KE LIYE DEKHTE HAIN JISKA SAMMAN SUPRIM COURT KO BHI KARNA CHAHIYE

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