जब किसी की जान पर बन आई हो तो उसे हमलावर की जान लेने का पूरा हक

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि जब किसी व्यक्ति की जान पर बन आई हो तो उससे कायरतापूर्ण आचरण की उम्मीद नहीं की जा सकती और आत्मरक्षा में उसे हमलावर की जान लेने का पूरा हक है। जस्टिस दलवीर भंडारी और जस्टिस अशोक कुमार गांगुली की बेंच ने कहा कि इन स्थितियों में कानून हमलावर की जान लेने की इजाजत देता है और इसे हत्या का अपराध नहीं माना जा सकता।

बेंच ने कहा, कानून किसी कायदा पसंद इनसान से ऎसी स्थिति में जबकि उसकी जान पर बन आई हो बुजदिली की उम्मीद नहीं करता। यह अदालत पहले भी कई बार कह चुकी है कि खतरा आने पर पीठ दिखाकर भाग जाना व्यक्ति की गरिमा को कम करता है। फैसले में बेंच ने कहा, इसलिए आत्मरक्षा के अधिकार के सामाजिक उद्देश्य हैं और इनका इस्तेमाल दायरे में रहकर किया जाना चाहिए।
इस मामले में पंजाब के लुधियाना जिले में 15 जुलाई 1991 को इस मामले के आरोपी दर्शन सिंह ने जमीन के एक झग़डे में अपने चाचा गुरचरण सिंह की जान ले ली थी। शीर्ष अदालत ने इस फैसले के साथ ही दर्शन सिंह को बरी कर दिया।
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