आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में एक समान फार्मूला नहीं लागू हो सकता

सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध की व्याख्या करते हुए 5 जनवरी को दिए अपने एक फैसले में कहा है कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामलों में एक समान फार्मूला नहीं लागू हो सकता। उस पर उसके तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार विचार होना चाहिए। न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी व न्यायमूर्ति एके पटनायक की पीठ ने आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी आंध्र प्रदेश केजी मोहन रेड्डी को बरी करते हुए कहा कि उसे उकसाने का दोषी नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने फैसलों में अदालतों को सचेत कर चुकी है कि ऐसे मामलों में तथ्यों और परिस्थितियों का आकलन करने में बहुत सावधानी बरती जानी चाहिए। ट्रायल में अदालत को देखना चाहिए कि क्या इस बात के साक्ष्य हैं कि पीड़ित के साथ ऐसी क्रूरता की गई कि वह आत्महत्या के लिए प्रेरित हुआ या हुई।

पीठ ने कहा, ‘स्वाभिमान के बारे में सबकी सोच भी अलग-अलग हो सकती है ऐसे में एक फार्मूला निश्चित करना असंभव है। उकसाना एक मानसिक प्रक्रिया है जो किसी व्यक्ति को जानबूझकर कुछ करने के लिए प्रेरित करती है। जब तक कि अभियुक्त किसी को आत्महत्या के लिए उकसाने या प्रेरित करने का कोई काम नहीं करता या उसमें मदद नहीं करता उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में सजा नहीं दी जा सकती।

अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 306 [आत्महत्या के लिए उकसाने] के मामले में तभी सजा सुनाई जाए जबकि उस व्यक्ति का अपराध करने का साफ तौर पर इरादा दिखाई देता हो। इस मामले में रेड्डी को उसके खेतों पर काम करने वाले रामलू को आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में सजा सुनाई गई थी। सत्र अदालत ने उसे दस साल और हाई कोर्ट ने पांच साल कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने रेड्डी को बरी करते हुए कहा कि तथ्यों और साक्ष्यों को देखने से यह साबित नहीं होता कि उसने रामलू को आत्महत्या के लिए उकसाया था।

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