पुलिस चार्जशीट में नाम होने मात्र से ही अग्रिम जमानत से इंकार नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल पुलिस आरोप-पत्र में किसी व्यक्ति को आरोपित गिए जाने के आधार पर अदालत उसे अग्रिम जमानत देने से इनकार नहीं कर सकती। जस्टिस तरूण चटर्जी और जस्टिस सुरिन्दर सिंह निज्जर की खंडपीठ ने जयपुर के रवींद्र सक्सेना के मामले में यह फैसला सुनाया। सक्सेना पर एक प्रॉपर्टी डीलर के साथ धोखाध़डी करने का आरोप था। डीलर का कहना था कि सक्सेना ने वादे के मुताबिक अपने दो फ्लेट उसे नहीं बेचे। मामले की सुनवाई करने वाली खंडपीठ ने कहा कि सक्सेना मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह गलत था। सुप्रीम कोर्ट ने सक्सेना को गत 15 दिसंबर को अग्रिम जमानत दे दी। खंडपीठ ने यह फैसला 19 दिसम्बर को जारी किया।

खंडपीठ ने फैसला अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत सुनाया। इससे पहले सक्सेना ने जयपुर की एक अदालत और राजस्थान हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी लगाई थी। हाईकोर्ट ने उसकी अर्जी दो बार और जयपुर की निचली अदालत ने एक बार खारिज कर दी थी।
सक्सेना पर प्रॉपर्टी डीलर करणसिंह ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2007 में अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उसने उसे फ्लेट नहीं बेचे। सक्सेना के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सिंह ने सक्सेना के पिता और मां के खिलाफ भी धोखाध़डी का आरोप लगाया था। राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने पर खंडपीठ ने कहा, हमारे विचार से हाईकोर्ट ने कानून के अनुसार ब़डी गलती की है। कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को नहीं समझा। हाईकोर्ट को परिस्थितियों और तथ्यों की जांच कर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था।
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