42 वर्ष मुकद्दमा चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि संबंधित अदालत को मामला चलाने का अधिकार नहीं!

मुंबई के एक फ्लैट मालिक, सालेभाई अलीभाई रंगवाला के उत्तराधिकारियों ने किराएदार से अपना फ्लैट खाली कराने के लिए चार दशक पूर्व कानूनी लड़ाई शुरू की थी। अलीभाई रंगवाला ने दोसाभाई को फ्लैट किराए पर दिया। दोसाभाई की बहन धनभाई बाटलीवाला भी उनके साथ रहने लगी। 1953 में दोसाभाई की मौत के बाद बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट 1947 के तहत बाटलीवाला किराएदार बन गईं। 1963 में उसकी मौत हो गई पर इसके पहले 1959 में उन्होंने अपनी वसीयत में ट्रस्टी नियुक्त कर दिए थे, जिन्होंने न तो फ्लैट खाली किया न बकाया किराया चुकाया। प्रिंसेस स्ट्रीट पर स्थित यह फ्लैट 1950 के दशक की शुरुआत में 104.10 रुपए प्रतिमाह में किराए पर दिया गया था।

मोहम्मद मेंशन स्थित 2-बी फ्लैट के मूल मालिक के कानूनी उत्तराधिकारियों को मूल किराएदार की मृत्यु के बाद फ्लैट का कब्जा लेने के साथ 1 नवंबर 1964 से 31 मार्च 1967 के बीच बकाया किराए के रूप में कुल 3018.90 रुपए पाने के लिए भी मुकदमा लड़ना पड़ रहा है। तब मूल मालिक की मौत के बाद उन्होंने फ्लैट खाली करने को कहा था।

सालेभाई अलीभाई रंगवाला के कानूनी उत्तराधिकारियों ने फ्लैट पर कब्जा पाने के लिए सात वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। अब जस्टिस बीएन अग्रवाल, जीएस सिंघवी तथा एचएल दत्तू की बेंच ने फ्लैट का कब्जा पाने के लिए उन्हें मुंबई के समुचित फोरम के पास जाने को कहा है।

कोर्ट का कहना है कि मुंबई की लुघ मामलों संबंधित अदालत को यह मामला चलाने का अधिकार नहीं था। हालांकि शीर्ष अदालत ने मामला 42 साल चलने पर खेद जताते हुए कहा कि नया मामला, उस पर की गई अपील, समीक्षा याचिका आदि सारे मामले एक साल में निपटा दिए जाने चाहिए।
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  2. यह हमारी न्याय व्यवस्था का सब से बड़ी विडम्बना है कि इस तरह के बिंदु इतनी देर से तय होते हैं। न्यायपालिका और पक्षकार 42 साल घास खोदते रहे और पता भी तब चला जब सुप्रीम कोर्ट यह कह रहा है। इस का कोई तो मार्ग न्यायपालिका या विधायिका को निकालना चाहिए।
    इस कारण भी है कि हमारे देश में हमने विविध प्रकार की अदालतें बना डाली हैं। अदालतों की विविधता समाप्त होनी चाहिए और दो ही तरह की अदालतें होनी चाहिए। दीवानी और फौजदारी।

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