सरकारी वकील को बचाने के लिए प्राईवेट वकील किया गया

दैनिक भास्कर में एक दिलचस्प खबर छपी है कि जो महिला वकील बड़े-बड़े अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए प्रोसिक्यूशन की तरफ से पैरवी करती है, आज उसे अपने बचाव के लिए एक वकील की जरूरत आन पड़ी। हैरत की बात यह भी थी कि करीब छह साल पुराने इस मामले में शिकायतकर्ता की अदालत में गवाही भी शुरू नहीं हो पा रही थी और उल्टा उसके गिरफ्तारी वारंट जारी हो गए थे। 29 सितम्बर को जब अतिरिक्त सैशन जज सुनीता कुमारी की अदालत में शिकायतकर्ता व डीसी आफिस के एक कर्मी की गवाही शुरू हुई, तो सरकारी महिला वकील के बचाव के लिए एडवोकेट अजय कुमार विरमानी अदालत में पहुंचे हुए थे। शिकायतकर्ता और डीसी आफिस के कर्मी की गवाही पर अब एडवोकेट विरमानी क्रास एग्जामिनेशन (बहस) करेंगे।

इस रिपोर्ट में महेन्द्रपाल गुप्ता लिखते हैं कि मजीठा हाउस कालोनी, निवासी शशि मोहन चोपड़ा ने 25 जुलाई, 03 को एक सरकारी महिला वकील को 35 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़वाया था। शिकायतकर्ता के अनुसार इसकी शिकायत पर थाना सुल्तान विंड में चरणजीत सिंह आदि कुछ लोगों के खिलाफ चोरी का मामला दर्ज हुआ था। इसकी कई बार किसी न किसी के आदेश पर जांच हो रही थी। तत्कालीन डीसी ने भी मामले की रिपोर्ट मांगी, तो सरकारी महिला वकील ने खुद उससे संपर्क कर रिपोर्ट उसके पक्ष में करने के लिए 50 हजार रुपए की मांग की थी। बाद में उससे 35 हजार रुपए पर सहमति जता कर उन्होने विजीलैंस ब्यूरो के पास शिकायत कर दी थी। रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद हालांकि विजीलैंस ब्यूरो ने 29 जुलाई, 2003 को चालान भी तैयार कर दिया हुआ था, किंतु इस चालान को विजीलैंस ब्यूरो ने 6 अगस्त, 2005 को अदालत में पेश किया था।

जबकि इस चालान को 60 दिनों के अंदर अदालत में पेश करना चाहिए था। इस खामीं के कारण आरोपी महिला वकील को अदालत ने सीआरपीसी की धारा 167(2) के तहत जमानत प्रदान कर दी थी। चोपड़ा ने बताया कि जमानत पर छूटने के बाद आरोपी महिला वकील ने खुद को आरोपमुक्त करवाने के लिए कई बार हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने 10 सितंबर, 08 को आरोपी महिला की याचिका को अनावश्यक मानते हुए खारिज कर दिया था।

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