मौत की सजा पर, क्षमा याचिकाओं का बिना विलंब फैसला करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह बिना किसी विलंब के उन लोगों की क्षमा याचिकाओं पर फैसला करे जिन्हें अदालतों ने मौत की सजा सुनाई है। मध्य प्रदेश के मनासा जिले में अपनी पत्नी और पांच बच्चों की हत्या करने वाले जगदीश को सुनायी गयी मौत की सजा के फैसले को बरकरार रखते हुए शीर्ष अदलत ने कहा कि क्षमा याचिकाओं पर फैसला करने में सरकार की नाकामी से दोषी करार दिये गये उन लोगों के साथ नाइंसाफी होती है जिनकी सजा उम्र कैद में तब्दील हो सकती है। इससे पहले के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर मौत की सजा देने और क्षमा याचिकाओं का निपटारा करने में सरकार की ओर से अत्यधिक विलंब होता है तो कैदी अपने मत्युदंड को उम्र कैद में तब्दील करने का हकदार है अन्यथा यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।

शीर्ष अदालत ने 1971 में विवियन रॉड्रिक बनाम पश्चिम बंगाल के मामले में कहा था कि हमें ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता के मामले के निपटारे में काफी ज्यादा विलंब होना अपने आप में धारा 302 के तहत कम सजा यानी उम्र कैद लागू करने के लिये पर्याप्त है। न्यायालय ने कहा कि उपर दोबारा रखी गयी टिप्पणी वर्तमान में सामयिक है क्योंकि राष्ट्रपति के समक्ष 26 क्षमा याचिकाएं लंबित हैं। कुछ मामले ऐसे हैं जहां अदालतों ने मौत की सजा एक दशक से पहले सुनायी थी। न्यायमूर्ति एचएस बेदी और जेएम पांचाल की पीठ ने इस फैसले में कहा कि हम इस मौके को सरकारों को उपरोक्त उल्लेखित वैधानिक तथा संवैधानिक प्रावधानों के तहत उनके संबंधित दायित्वों को याद दिलाने के रूप में लेते हैं।

जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी और संसद पर हमले के मामले में दोषी करार दिये गये मोहम्मद अफजल की मौत की सजा को शीर्ष अदालत के अगस्त 2005 में बरकरार रखने के बाद भी सरकार को उसे अब भी फांसी पर चढ़ाना बाकी है और इसके लिये वह उसकी क्षमा याचिका लंबित होने का हवाला देती है। शीर्ष अदालत ने उन कैदियों के लिये सहानुभूति जताई जिन्हें मौत की सजा सुनाई गयी है, लेकिन सरकार की निष्क्रियता के चलते उन्हें फांसी पर चढ़ाने में विलंब हो रहा है।

इस याचिका के मामले में जगदीश को अपनी पत्नी, पांच पुत्रियों और एक पुत्र की हत्या करने के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी पाया गया था। बच्चों की उम्र एक से 16 वर्ष के बीच थी। उसे मनासा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 24 अप्रैल 2006 को मौत की सजा सुनायी थी। जगदीश ने दलील दी थी कि उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी। उसने कहा था कि उसकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया जाये क्योंकि उसे तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी फांसी नहीं दी गयी है। बहरहाल, शीर्ष अदालत ने कहा कि सत्र अदालत द्वारा दोषी करार दिये जाने के समय से उसकी अपील 18 सितंबर 2009 में ठुकराये जाने तक ज्यादा विलंब नहीं हुआ था।
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One thought on “मौत की सजा पर, क्षमा याचिकाओं का बिना विलंब फैसला करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट”

  1. अदालत ने याद दिला दिया है, देखते हैं सरकार क्या करती है।

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