धारा 302 के तहत उम्रकैद का सश्रम होना परिभाषित नहीं है

सुप्रीम कोर्ट हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए कैदी से दंड भोगने के दौरान जेल में कड़ी मेहनत वाले काम कराए जाने की जरूरत से जुड़े एक दिलचस्प सवाल पर विचार करने राजी हो गया है। न्यायमूर्ति तरूण चटर्जी और न्यायमूर्ति आर एम लोढा की पीठ ने हत्या के दोषी पाए गए डी. बालचंद्र पांचाल की दलील पर गुजरात सरकार से जवाब मांगा है। पांचाल का कहना है कि राज्य की एक सत्र अदालत ने उसे गलत ढंग से आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इस सजा को बाद में गुजरात हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

वरिष्ठ अधिवक्ता पंडित परमानंद कटारा ने अदालत में पांचाल का पक्ष रखते हुए कहा कि ऐसे दंड को सश्रम के बजाय सिर्फ सामान्य कारावास बनाया जाना चाहिए। पांचाल की दलील का मुख्य उद्देश्य यह बात कहना था कि एक हत्याभियुक्त, जिसे पूरी जिंदगी या कम से कम 14 साल तक जेल में रहना है, उससे मेहनत भरे काम करवाना उसके साथ ज्यादती है। दलील में कहा गया है कि सजा के दौरान कराए जाने वाले ‘श्रम’ में जमीन खोदना, खेत की जोताई करना और लगभग 500 बंदियों के लिए खाना पकाना शामिल है।
पांचाल ने कहा कि भारतीय दंड विधान की धारा 302 के तहत उम्रकैद के सश्रम होने को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। पांचाल को इंद्रसिंह नामक व्यक्ति की हत्या करने के आरोप में दोषी पाए जाने पर उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
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