कोर्ट मार्शल से पहले चार दिन का समय अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

केंद्र सरकार की दलील नामंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी भी जुर्म के लिए कोर्ट मार्शल से पहले सेना जवान को चार दिन का समय अनिवार्य रूप से दे। सेना संबंधी नियम 34 केवल निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं। इस नियम के तहत किसी जवान पर आरोप लगाने और वास्तव में मुकदमा शुरू के बीच 96 घंटों का अंतराल होना चाहिए। दरअसल 12वीं कोर सिग्नल रेजीमेंट, जोधपुर के एके पांडेय को सेना से निकाल दिया गया था तथा 6 नवंबर 1995 को कोर्ट मार्शल की कार्यवाही करते हुए तीन साल जेल की सजा सुना दी गई थी। सेना से बर्खास्तगी और अपने अभियोजन को पांडेय ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पांडेय के तर्कों को मानते हुए उसे दी गई सजा खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ केंद्र ने शीर्ष कोर्ट में अपील की थी।

जस्टिस बीएन अग्रवाल, आफताब आलम और आरएम लोढा की तीन सदस्यीय बेंच ने अपने फैसले में कहा, ‘इस प्रावधान (नियम 34) का एक मकसद है। यह मकसद है कि इससे पहले आरोपी को मुकदमे के लिए बुलाया जाए, उसे आरोपों के बारे में ठंडे दिमाग से सोचने के लिए पर्याप्त वक्त दिया जाए। अपने बचाव के बारे में सोचने और अधिकारियों से पूछने और जरूरत पड़ने पर गवाह हाजिर करने के लिए उचित कदम उठाने का मौका मिल सके।’

बेंच ने केंद्र की अपील ठुकराते हुए कहा, मौजूदा मामले में चूंकि आरोपी को अपने बचाव के बारे में सोचने के लिए अनिवार्य 96 घंटे का समय नहीं दिया गया। ऐसे में उसे दोषी ठहराना अवैध है।

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