अंतहीन लड़ाई और न सुलझने वाली तकरार भी तलाक का कारण हो

विधि आयोग ने केंद्र से हिंदू मैरेज एक्ट-1955 और स्पेशल मैरेज एक्ट-1854 में तुरंत बदलाव की सिफारिश की है। तर्क यह दिया गया है कि विवाह में होने वाली अंतहीन लड़ाई और न सुलझने वाली तकरार को भी हिंदू दंपतियों के लिए तलाक का कारण बनाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतहीन लड़ाइयों और विवाद वाले विवाहों को खत्म करने का कोई तरीका नहीं है। ऐसी शादी बस कल्पना बन कर रह जाती है। वह सिर्फ कानूनी शादी रह जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, टूटती शादी को बचाने की हर संभव कोशिश जरूर की जानी चाहिए। लेकिन जो शादी न सुलझने वाली तकरार से दो-चार हो और जहां समझौते की कोई गुंजाइश न हो, वहां सार्वजनिक हित सच्चई को स्वीकारने में ही है। विधि आयोग की यह रिपोर्ट जस्टिस ए आर लक्ष्मणन ने दी थी।

उन्होंने कहा कि कोर्ट को शादी में हो रही अंतहीन लड़ाई के आधार पर तलाक की अनुमति देनी चाहिए। साथ ही, उसे बच्चों और संबंधित पक्ष को पर्याप्त रकम दिलाने की पक्की व्यवस्था भी करनी चाहिए। रिपोर्ट का विरोध आज तक इस आधार पर किया जाता है कि अंतहीन लड़ाई वाली शादियों को आपसी सहमति से तलाक के आधार पर सुलझाया जाता है। इसे 1976 में हिंदू मैरेज एक्ट में शामिल किया गया था। रिपोर्ट कहती है कि ऐसे मामलों में जहां समझौते की गुंजाइश नहीं, वहां तलाक का फैसला पक्षों की इच्छा पर नहीं, बल्कि कोर्ट की मर्जी पर निर्भर करता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1978 में विधि आयोग ने भी ऐसी ही अनुशंसा की थी। तब उसके अध्यक्ष जस्टिस एच आर खन्ना थे। जिक्र है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली में भी सरकार को हिंदू मैरेज एक्ट पर गंभीरता से विचार की सलाह दी थी। हालांकि, 12 मार्च 2009 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मरकडेय काटजू और वी एस सिरपुरकर की बेंच ने कहा था कि कोर्ट द्वारा अंतहीन लड़ाई या इस तरह की किसी बात को तलाक के लिए आधार बनाकर नहीं जोड़ा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि दरअसल यह काम तो विधायिका का है।

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