जज को जस्टिस नहीं कहूँगी, नहीं कहूँगी -वह भी हमारी तरह महज एक व्यक्ति हैं

पिछले दिनों 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में उस समय अजीब स्थिति पैदा हो गई जब न्यायालय की अवमानना के आरोपों का सामना कर रही लड़की ने न्यायमूर्ति पसायत के नाम के आगे जस्टिस लगाने से इनकार कर दिया। एनिट कोटियन ने जैसे ही कहा- पसायत, कोर्ट ने आपत्ति की और नाम के आगे जस्टिस लगाने का आदेश दिया। कोटियन ने नहीं माना और मिस्टर पसायत कहा। संबोधन के तरीके पर नाराज पीठ ने कहा कि मिस्टर नहीं, जस्टिस पसायत बोलो। कोर्ट की मर्यादा का ध्यान रखो, लेकिन कोटियन अड़ गई। उसने पीठ से मुखातिब हो कर कहा कि वे जस्टिस नहीं हैं। मेरे दिल में उनके लिए कोई सम्मान नहीं है।

इस आचरण पर सौम्य स्वभाव वाले न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर को क्रोध आ गया। उन्होंने कोटियन को आदेश दिया कि उसे जस्टिस कह कर संबोधित करना ही होगा। कोटियन ने इतने पर भी नहीं माना। आखिरकार उसने जज को जस्टिस कह कर संबोधित नहीं ही किया। उसने न्यायाधीशों से कहा, ‘आप लोग भी हमारी तरह महज व्यक्ति हैं। कानून के सामने सब समान हैं।’ पीठ ने इस पर भी ऐतराज जताया।
कोर्ट ने कहा कि क्या उसकी निगाह में संवैधानिक संस्थाओं का कोई सम्मान नहीं है? वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अटार्नी जनरल के खिलाफ कार्रवाई चाहती है? कोटियन की दलील थी कि वह सिर्फ संविधान का सम्मान करती है। उसे देश की संप्रभुता की चिंता है। कोटियन व अन्य आरोपियों के व्यवहार से अदालत खफा हो गई और उनके खिलाफ अवमानना के नए नोटिस जारी कर दिए।
जस्टिस पसायत पर जूता फेंकने के आरोप में बास स्कूल आफ म्यूजिक की चार लड़कियों के खिलाफ पहले ही न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चल रहा है। अवमानना कार्यवाही का सामना कर रही इन लड़कियों ने एक नई याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है, जिसमें राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग लाने और उन्हें दंडित किए जाने, प्रधानमंत्री को बुलाये जाने और अटार्नी जनरल को गिरफ्तार किए जाने की मांग की गई है। कोर्ट ने अभद्र आचरण और बेतुकी याचिका को न्यायालय की अवमानना मानते हुए लीला डेविड, एनिट कोटियन, पवित्रा मुरली व सरिता पारीख के खिलाफ नए अवमानना नोटिस जारी किए।
इसके पहले सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज जस्टिस बी. एन. अग्रवाल ने इन लड़कियों पर लगे अवमानना के आरोप की सुनवाई से मनाही कर दी थी।
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7 thoughts on “जज को जस्टिस नहीं कहूँगी, नहीं कहूँगी -वह भी हमारी तरह महज एक व्यक्ति हैं”

  1. जबरन सम्मान कराना भी कानून के दायरे में आता है ये बात आज इस पोस्ट से पता चल रही है या ये मात्र जज महोदय का दुराग्रह है। मुझे निजी तौर पर लगता है कि न्याय प्रणाली से जुड़े जज आदि खुद को संविधान से ऊपर मानते हैं और उनके व्यवहार में उनका निजी अहंकार भी कहीं न कहीं छिपा रहता है शायद। अब हो सकता है मेरी ये बात भी गैरकानूनी हो और मुझपर सौ-पचास धाराओं के तहत मुकदमा करके दोचार हजार साल की सजा सुनाई जा सके

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  2. कोर्ट का सम्मान होना चाहिये। इस मामले में बिना हठ के यह भी पता लगाया जाना चाहिये कि व्यक्ति इस तरह की भावना क्यों रख रहा है!

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  3. संस्थाओं का असम्मान अराजकता को निमंत्रण है. व्यक्तिगत स्वतंत्रता स्वछंद नहीं हो सकती उसका भी दायरा होता है.

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  4. रूपेश जी, ये मात्र किसी जज के सम्मान का प्रश्न नहीं है बल्कि ये हमारे समाज को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए बनाई गई संस्थाओं के प्रति सम्मान का प्रश्न है। इसे आप इस प्रकार समझते सकते है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पिता को सम्मान जनक शब्दो से सम्बोधित करने की बजाय उसके साथ ‘तू-तड़ाके’ से बात करे और उसका पिता उसे सम्मानपूर्वक बोलने को कहे तो इसे ‘जबरन सम्मान कराना’ नहीं कहेगें। समाज में व्यक्तिगत स्वछनदता के स्थान पर प्रत्येक के लिए आदर और सम्मान की भावना बनाये रखने के लिए स्थापित इन संस्थाओं की यदि हर कोई इस प्रकार अनादर करेगा तो हम आदिम युग में पहुँच जायेंगें। इन महिलाओं का पूर्व आचरण एवं वर्तमान आचरण यह इंगित करता है कि ये मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाएं है जिन्हे सजा की बजाये ईलाज की आवश्यकता है।

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  5. किसी से भी जोर जबरदस्ती नहीं करानी चाहिए पर कोटियान द्बारा प्रचलित और पारम्परिक भद्रता भी दिखानी चाहिए थी !बड़ों का सम्मान भारतीय संस्कृति के सुनहले नियमों में है !

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  6. ये घटना इस बात की ओर इशारा कर रही है कि…न्याय्पालिका की छवि भी अब लोगों की नज़र में बदल रही है…रही बात सम्मान की तो अभी स्थिति उतनी बदतर नहीं हुई कि कोटियन वाला रास्ता पकड लिया जाये….

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  7. न्यायालयों और न्यायाधीशों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान सदैव अपने चरित्र से अर्जित किया जाता है। यह घटना इस बात की द्योतक है कि न्यायपालिका का सम्मान गिर रहा है। वह इंसान की आशाओं पर खरी नहीं उतर रही है। यह मौजूदा न्यायपालिका के लिए आँखे खोल देने वाली घटना है।

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