अपने ही आदेशों को, वैधानिक नियमों के खिलाफ बताया सुप्रीम कोर्ट ने

सुप्रीम कोर्ट 19 अगस्त को आत्मावलोकन की मुद्रा में नजर आया। सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा तलाक की कार्यवाही जैसे मसलों पर विभिन्न नियमों का उल्लंघन करते हुए निर्देश देने के प्रचलन की अदालत ने आलोचना की। जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस अशोक कुमार गांगुली की बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 में दिए गए विशेष अधिकारों का हवाला देकर भी ऐसे निर्देश नहीं दे सकता। कोर्ट ने खेद जताया कि हिंदू मैरिज ऐक्ट भी किसी जोड़े को इस आधार पर तलाक देने की इजाजत नहीं देता कि उनके रिश्ते फिर कभी नहीं सुधर सकते। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस आधार पर तलाक के आदेश दे रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे कम से कम नौ आदेश हैं, जिनमें इस आधार पर तलाक की मंजूरी दे दी गई है।

जस्टिस काटजू ने 1990 में तत्कालीन चीफ जस्टिस जे. एस. वर्मा द्वारा जारी निर्देश पर भी नाराजगी प्रकट की। एम.सी. मेहता के इस केस में अदालत ने दिल्ली में वाहनों की अधिकतम स्पीड लिमिट 40 किमी प्रति घंटे सीमित करने का प्रशासन को निर्देश दिया था। इसके अलावा, वाहनों के आवागमन के लिए लेन सिस्टम बनाने की बात कही थी। जस्टिस काटजू ने कहा कि मैं जस्टिस वर्मा का बहुत सम्मान करता हूं लेकिन मुझे लगता है कि अदालतें ऐसे मामलों में निर्देश नहीं दे सकतीं। ऐसे मामलों में फैसला सेंट्रल मोटर वीइकल ऐक्ट के तहत गठित प्रशासन को लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मशहूर विशाखा केस में भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार को निर्देश देना गलत था। 13 अगस्त 1997 को इस मामले में अदालत ने सरकार को दफ्तरों में महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न के मामलों पर विचार करने के लिए विशेष समिति बनाने का निर्देश दिया था। जस्टिस काटजू ने कहा कि मैं ऐसे निर्देश से सहमत नहीं हूं। कानून बनाना अदालत का काम नहीं है। संविधान के हर अंग विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अलग-अलग काम हैं और हमें उसका पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 में दिए अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कुछ आदेश और निर्देश दिए हैं, जो वैधानिक नियमों के खिलाफ हैं।

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2 thoughts on “अपने ही आदेशों को, वैधानिक नियमों के खिलाफ बताया सुप्रीम कोर्ट ने”

  1. लोकेश जी ,
    अदालत का ये नया स्वरुप उसकी एक माह की छुट्टी को सार्थक बना गया..बहुत ही बढ़िया..लगता है की हाँ …इसे ऐसा ही होना चाहिए था..अब अच्छा, नहीं की बहुत ही अच्छा लग रहा है …ये ताजातरीन फैसला एक नयी बहस को जन्म देगा ..खुद न्यायिक क्षेत्र में ही….नए स्वरुप के लिए बधाई

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  2. लोकेश जी,
    अदालत का ये नया स्वरुप बहुत ही बढ़िया लग रहा है, नए स्वरुप के लिए बधाई

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