सेना ट्राइब्यूनल 8 अगस्त से शुरू होगा

सेना के जवानों और अधिकारियों के लिए गठित सशस्त्र सेना ट्राइब्यूनल आगामी अगस्त के पहले पखवाड़े से काम करना शुरू कर देगा। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह द्वारा 8 अगस्त को इस ट्राइब्यूनल की दिल्ली स्थित प्रधान पीठ का उद्घाटन किये जाने की संभावना हैं। इसके साथ ही उन जवानों और सैन्य अधिकारियों को राहत मिलेगी जिन्हें लगता है कि सेना अदालतों (कोर्ट मार्शल) के जरिए उनके साथ अन्याय हुआ है। साथ ही पेंशन, प्रमोशन आदि मामलों में बरते गए भेद-भाव से पीड़ित सैनिकों को भी अब जल्दी न्याय मिल सकेगा।

सेना से जुड़े इस तरह के करीब दस से बारह हजार मामले विभिन्न नागरिक अदालतों में लंबित पड़े हैं। इनमें करीब साढ़े सात हजार मामले कोर्ट मार्शल फैसलों के खिलाफ हैं। ये सभी मामले अब इस ट्राइब्यूनल में स्थानांतरित हो जाएंगे और उम्मीद है कि 90 दिनों में इन का निपटारा किया जा सकेगा। दैनिक हिन्दुस्तान में सुशील शर्मा की रिपोर्ट है कि शुरू में कुछ देरी हो सकती है क्योंकि मामलों की संख्या बहुत बड़ी है लेकिन ट्राइब्यूनल दिन-रात काम करते हुए इन्हें जल्दी से जल्दी निपटाएगा।

इस ट्राइब्यूनल के अध्यक्ष के रूप में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमार माथुर को गत वर्ष अगस्त में ही नियुक्त कर दिया गया था। गत 22 जून को इसके आठ न्यायिक और 15 प्रशासनिक सदस्यों के नामों की घोषणा की गई थी। अध्यक्ष और रजिस्ट्रार समेत ट्राइब्यूनल के कुल 31 सदस्य होंगे जिनमें से सात की नियुक्ति और होनी है। इस ट्राइब्यूनल की प्रमुख दिल्ली पीठ के अलावा चंडीगढ़, लखनऊ, कोलकाता, मुंबई, कोच्चि, चेन्नई, गुवाहाटी और जयपुर में क्षेत्रीय पीठें होंगी।

ले.कर्नल पी.पी.सिंह बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1982 में इस ट्राइब्यूनल के गठन की जरूरत बताई थी और विधि आयोग ने समर्थन भी किया था। दो साल पहले संसद शीतकालीन सत्र में आम्र्ड फोर्सेस ट्राइब्यूनल एक्ट 2007 पारित किया था और राष्ट्रपति ने गत 25 दिसंबर 2007 को इसे मंजूरी दी और 28 दिसंबर 2007 को इसे अधिसूचित किया गया। गत वर्ष जुलाई में कैबिनेट ने इसके सदस्यों को मंजूरी दी थी

कोर्ट मार्शल के फैसलों के खिलाफ सैन्य अदालतों में अपील का प्रावधान न होने के कारण बहुत से पीड़ित सिविल अदालतों में ऐसे फैसलों को चुनौती देते रहे हैं। चूंकि सिविल अदालतों में पहले ही लाखों केस लंबित है लिहाजा सैनिकों को समय पर न्याय नहीं मिल रहा था। कोर्ट मार्शल के फैसलों के खिलाफ सेना में सुनवाई की व्यवस्था न होने की कड़ी आलोचना भी होती रही है। इस तरह की एक तरफा न्याय प्रणाली को अंग्रेजों की विरासत माना जाता है जिन्होंने अपने शासन काल में भारतीय सैनिकों पर पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की थी।

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