सुप्रीम कोर्ट ने विशेष पुलिसकर्मियों की सेवाएं नियमित करने का सुझाव दिया

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को असम में अनुबंध पर काम कर रहे करीब 1300 विशेष पुलिसकर्मियों (पूर्व सैनिकों) की सेवाएं नियमित करने के सुझाव पर विचार करने को कहा है। न्यायालय का मानना है कि घुसपैठियों का पता लगाने में जुटे बल का मनोबल इससे बढ़ेगा। न्यायाधीश आर वी रविन्द्रन और न्यायाधीश बी सुदर्शन रेड्डी की पीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण कार्य और ड्यूटी में लगे कर्मचारी कठिन और विपरीत परिस्थितियों में काम करते हैं और यदि उन्हें अपनी नौकरी सुरक्षित रहने का भरोसा होगा और भविष्य की चिंता नहीं होगी तो वे बेहतर तरीके से काम कर सकेंगे।

विदेशी घुसपैठियों को असम से देश में घुसने देने से रोकने के काम में लगे इन कर्मचारियों की तैनाती असम सरकार द्वारा प्रिवेंशन आफ इनफिलट्रेशन आफ फोरेनर्स स्कीम (PIF) 1960 के तहत की जाती है। इस योजना के तहत राज्य बलों को भर्ती करता है और उनके वेतन आदि का भुगतान केंद्र करता है। असम सरकार ने 17 मार्च 1995 को एक परिपत्र निकाला जिसके तहत यह फैसला किया गया कि इन कर्मचारियों का सेवाकाल एक साल का अनुबंध होगा। इस प्रकार इन कर्मचारियों को राज्य पुलिस और अ‌र्द्धसैनिक बलों को इस प्रकार की ड्यूटी करते हुए मिलने वाले लाभों से वंचित कर दिया गया। अब्दुल कादिर तथा अन्य पीड़ित कर्मचारियों ने असम हाईकोर्ट के समक्ष इस भेदभावपूर्ण नीति को चुनौती दी और एकल पीठ ने सर्कुलर को खारिज कर दिया तथा उनकी सेवाओं को नियमित करने का निर्देश दिया।

लेकिन एक खंडपीठ ने राज्य सरकार की नीति को सही ठहराया जिसके बाद पीड़ित कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की। उनकी याचिका को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये कर्मचारी एक दशक से अधिक समय से सेवारत हैं और इनकी सेवाओं को नियमित नहीं किया गया गया है। न्यायालय ने कहा कि दशकों से सेवा में लगे तदर्थ या अस्थाई कर्मचारियों को यदि नियमित में बदल दिया जाता है तो इससे उनका मनोबल और कार्य कुशलता बढ़ेगी।

पीठ ने कहा कि वह इस तथ्य से अवगत है कि ये नीतिगत फैसले होते हैं जिनका बेहतर समाधान सरकार द्वारा ही किया जा सकता है और इसीलिए न्यायालय ने सरकार से विशेष पुलिस कर्मियों की सेवाओं को नियमित करने के उसके सुझावों का अध्ययन करने को कहा है।

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