फांसी की जरूरत नहीं, क्योंकि रखैल के उकसावे में आकर की गई ह्त्या से अपराध की गंभीरता कम हो जाती है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उसने उन दो आरोपियों के लिए फांसी की सजा मांगी थी, जिन्होंने अपनी सामूहिक रखैल के साथ साठगांठ कर उसके पति और बेटे समेत 4 लोगों की 1994 में सरहिंद में हत्या कर दी थी। कोर्ट ने एक आदेश में कहा कि दोनों को फांसी देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपनी रखैल के उकसावे में आकर हत्याओं को अंजाम दिया। इस कारण अपराध की गंभीरता कम हो जाती है। न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा और न्यायमूर्ति बी.एस.चौहान की खंडपीठ ने कहा, ‘इस सच्चाई में कोई संदेह नहीं कि दोनों ने क्रूरतापूर्वक चार व्यक्तियों की हत्या उस समय कर दी जब वे सो रहे थे। लेकिन इस मामले की गंभीरता को कम करने वाली स्थितियां मौजूद हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने 28 मई को दिए और बाद में जारी किए अपने फैसले में कहा है, ‘दोनों व्यक्तियों का व्यवहार कुछ इस तरह से लिया जाएगा कि दोनों ने प्रेमांधता में आकर इस अपराध को अंजाम दिया। इनकी सहेली ने अपने परिवार द्वारा खुद के साथ की जा रही जिन ज्यादतियों के बारे में बताया, दोनों ने उसकी सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की।’ कोर्ट ने कहा कि इस बात में कोई संदेह नहीं कि दोनों ने बहुत अमानवीय काम किया है, लेकिन हमारे विचार से इसके लिए हाई कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा काफी है।

दरअसल, सरहिंद कस्बे के नगरायुक्त सेवा सिंह और उनके बेटे रछपाल सिंह उर्फ हैपी और स्थानीय गुरुद्वारे के दो सेवादारों इंदरजीत सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या कर दी गई थी। गुरुद्वारे के ही दो पूर्व सेवादारों कमलजीत सिंह और मंजीत सिंह ने इन हत्याओं को अंजाम दिया था। इन दोनों का सेवा सिंह की पत्नी के साथ अवैध संबंध था। एक स्थानीय अदालत ने इस मामले में दोनों आरोपी पूर्व सेवादारों को फांसी तथा महिला को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दोनों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया था। पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और दोनों आरोपियों को फांसी की सजा देने की मांग की थी।

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One thought on “फांसी की जरूरत नहीं, क्योंकि रखैल के उकसावे में आकर की गई ह्त्या से अपराध की गंभीरता कम हो जाती है: सुप्रीम कोर्ट”

  1. मेरे खयाल में तो फाँसी किसी के लिए कोई सजा ही नहीं है। इस तरह तो अपराधी को जीवन और उस के कष्टों से ही मुक्ति मिल जाती है। असली सजा तो मृत्यु तक किसी को कैद रखना ही है।

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