दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग हो तब भी उसकी गवाही किसी को दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दुष्कर्म के मामले में पीड़िता नाबालिग हो तब भी उसकी गवाही किसी को दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त है। न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा और बी.एस. चौहान की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसा कोई ठोस कारण नजर नहीं आता कि दुष्कर्म की शिकार लड़की किसी निर्दोष व्यक्ति का नाम लेगी। पीठ ने कहा कि कानून के मुताबिक पीड़िता की गवाही यदि विश्वसनीय लगे तो केवल उस आधार पर भी धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत सजा दी जा सकती है। यह व्यवस्था देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 26 वर्षीय अभियुक्त सुरेश कुमार की रिहाई के हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया।

15 मार्च 2000 को सुरेश ने करीब 12 साल की एक लड़की के साथ दुष्कर्म किया था। उसने लड़की को चुप रहने के बदले पांच रुपये नकद और चीनी देने की कोशिश की थी। उस लड़की की गवाही और उसकी मां व बड़ी बहन के बयान पर बिलासपुर की निचली अदालत ने उसे सात साल की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने इन तीनों की गवाही को अपर्याप्त मानते हुए उसे दोषमुक्त करार दे दिया। पीड़िता की ओर से इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्ते के अंदर अभियुक्त सुरेश को अदालत में आत्मसमर्पण करने और जेल में रहते हुए बाकी सजा पूरी करने का आदेश दिया।

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि बलात्कार के मामलों में अगर पीड़िता बच्ची है तब भी उसका बयान आरोपी को दोषी ठहराने के लिए काफी है। न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा और बीएस चौहान की पीठ ने एक फैसले में कहा यह कानून की एक निर्धारित स्थिति है कि धारा 376 (बलात्कार) के अधीन अपराधों के लिए दोषसिद्धी एकमात्र बलात्कार पीड़िता के बयान पर आधारित की जा सकती है अगर यह भरोसेमंद और विश्वसनीय है।

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा वास्तव में इस तरह के मामले में जब पीड़िता जो घटना की तिथि पर अवयस्क लड़की थी आगे आई और कहा कि आरोपी ने उसके साथ बलात्कार किया है और उसकी गवाही को जिरह में नहीं हिलाया जा सका तो हमें उसपर शंका करने की कोई वजह नहीं है क्योंकि कोई लड़की इस तरह के अहम मुद्दों में कभी झूठ नहीं बोल सकती। उच्चतम न्यायालय ने कहा यहां तक की उसकी बहन और मां ने भी बताया कि कथित घटना के तुरंत बाद पीड़िता की ओर से क्या बताया गया था।

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