अदालत की सुनवाई हिंदी में भी हो

वकीलों के एक समूह ने आज, 18 जून को दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अदालत की सुनवाई हिंदी में भी करने की इजाजत दिए जाने का आग्रह किया। वकीलों का तर्क है कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। ऑल इंडिया लायर्स यूनियन (AILU) की दिल्ली इकाई ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि वकील जब हिंदी में दलील देते हैं तो न्यायाधीश उनकी बातों की ओर ध्यान नहीं देते। अंग्रेजी तो रूतबे का प्रतीक हो गयी है।

एआईएलयू की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल के अनुसार “हमारे संविधान की धारा 19 ए भी हमें किसी भी भाषा में अपनी बात रखने की आजादी देती है। ऐसे में अदालतों में हिंदी में दलील देने से रोकना मौलिक अधिकारों का हनन है।” उन्होंने कहा, “अपने देश में हिंदी सम्प्रेषण की सबसे प्रचलित भाषा है। ऐसा नहीं है कि हिंदी बोलने वालों को कानून का ज्ञान कम होता है।”

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3 thoughts on “अदालत की सुनवाई हिंदी में भी हो”

  1. न्यायलयों की भाषा हिंदी होनी चाहिए लेकिन व्यावहारिक समस्या हिंदी में उपलब्ध विधि की पुस्तकों की है। विधि ज्ञाता अनुवादकों की सहायता से यह कार्य किया जा सकता है तथा इसमें सफलता बी पाई जा सकती है। न्यायलयों में हिंदी की उपयोगिता आरम्भ करने का यह सही समय है अतएव प्रयास जारी ऱखना चाहिए।

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  2. राजस्थान उच्चन्यायालय में अधिकांश वकील हिन्दी में ही बहस करते हैं। वास्तव में वकील ही अपने आप को काबिल प्रदर्शित करने के लिए अंग्रेजी का उपयोग करने लगते हैं। ऐसे में अदालत क्यों हिन्दी में काम करेगी?
    ऑल इंडिया लायर्स यूनियन (एआईएलयू) उस के इस कदम के लिए बधाई की पात्र है। उसे वकीलों के मध्य भी यह अभियान चलाना चाहिए कि वे अधिक से अधिक काम हिन्दी में ही करें।

    एक शंका यह भी है कि कहीं अधिवक्ता और न्यायाधीशों का हिन्दी की विधि शब्दावली का ज्ञान कम होना या न होना तो अंग्रेजी प्रयोग का कारण नहीं है?

    लेकिन जहाँ हिन्दी में काम हो रहा है वहाँ विधिक शब्दावली का भी खूब प्रयोग हो रहा है। हिन्दी विधिक शब्दावली आम नहीं है। लेकिन उर्दू के पुराने शब्दों का बहुत प्रयोग हो रहा है, साथ ही अनेक दुरूह उर्दू शब्दों का स्थान हिन्दी ले रही है। हिन्दी करण की गति अधीनस्थ न्यायालयों में अच्छी है। लेकिन उच्चन्यायालयों में परेशानी यह भी है कि अनेक बार अहिंदी भाषी क्षेत्रों के जज हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पदासी न हो जाते हैं। परेशानियों के बाद भी यदि सदिच्छा हो तो हिन्दीकरण में तेजी लाई जा सकती है।

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  3. यह मेरे भारत देश में ही सम्भव है कि जहाँ सबसे ज्यादा बोले जाने वाली तथाकथित ‘राष्ट्रभाषा’ में पैरवी किये जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता है।

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