गवाह न होने पर भी, साक्ष्यों के आधार पर सजा दी जा सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषी करार दिया जा सकता है। भले ही अपराध का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण या गवाह न हो। लेकिन शर्त यह है कि अपराध को पूरी तरह साबित किया जा सके। न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत व अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने के संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए जिन पर संदेह की कोई गुंजाइश ही न हो। कोर्ट ने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जो मामले पूरी तरह पारिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर होते हैं वहां व्यक्ति के दोषी होने के फैसले को तभी उचित ठहराया जा सकता है जब अभियोग संबंधी सभी तथ्य व परिस्थितियां आरोपी को दोषी ठहराते हों। पीठ ने रियाजुद्दीन रफीयुद्दीन शेख की अपील को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।

महाराष्ट्र के जलगांव जिले के पारोला गांव के रहने वाले शेख ने 12 मई 1996 को अपनी पत्नी सयारबी को जला दिया। कोई चश्मदीद गवाह न होने पर सत्र अदालत ने आरोपी को हत्या का दोषी ठहराने के लिए पारिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर विश्वास किया और उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। आरोपी ने दावा किया कि उसकी पत्नी की मौत घर में शार्ट सर्किट हो जाने के चलते हुई। लेकिन वह अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत नहीं पेश कर सका। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी साबित हुआ कि महिला की मौत जलने से हुई और उसके शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़का गया था।
अभियुक्त ने सत्र अदालत के फैसले को बांबे हाई कोर्ट में चुनौती दी। वहां भी उसकी अपील खारिज हो गई। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
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2 thoughts on “गवाह न होने पर भी, साक्ष्यों के आधार पर सजा दी जा सकती है”

  1. उसे कोई पेशे के प्रति ईमानदार वकील नही मिल पाया होगा 🙂

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  2. सही बात है, कानून यही है। यह केवल पुनर्व्याख्या है।

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