सम्मान बचाने और लोकलाज से बचने के लिए ह्त्या करने वालों से अदालत की सहानुभूति

राज नामक 18 वर्षीय अविवाहित युवती के गर्भवती होने के बाद सामाजिक लोक लाज के कारण उसकी मां दर्शना ने छोटी बेटी रजनी के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी थी। बेटी की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाने वाली मां व बेटी की सजा दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखी है। जस्टिस प्रदीप नंदराज योग व जस्टिस अरुणा सुरेश की पीठ ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ मां-बेटी की अपील पर यह फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि भारतीय समाज का जो ढांचा है, उसमें अविवाहित लड़की को मां बनने को स्वीकार नहीं किया जाता है। इसी कारण सम्मान बचाने और लोकलाज के भय से यह हत्या की गई। कोर्ट ने कहा कि उन्हें आरोपियों के प्रति सहानुभूति है, परंतु अदालत के हाथ कानून से बंधे हैं। कोर्ट ने रजनी के भविष्य के प्रति चिंता जाहिर करते हुए कहा कि रजनी हत्या में मां की सहभागी रही, किंतु धारा-34 में दोनों के अपराध को बराबर माना गया है।
पेश मामले में 17 अप्रैल 2002 को उत्तामनगर थाना क्षेत्र के भगवती विहार इलाके में 18 वर्षीय राज की उसकी मां दर्शना और बहन रजनी ने चाकू व स्क्रूड्राईवर से हत्या कर दी थी।
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2 thoughts on “सम्मान बचाने और लोकलाज से बचने के लिए ह्त्या करने वालों से अदालत की सहानुभूति”

  1. अदालत की यह सहानुभूति इस लिए कि अपराधी समाज के भय से अपराध कर रहा था। समाज को कानून के जरिए बदलने प्रयत्न ऐसे ही अवसर पैदा करता है।

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  2. ये निर्णय बहुत प्रशंसनीय है साथ ही व्यव्हारिक भी.स्वागत योग्य कदम की मुक्तकंठ से सराहना करनी चाहिए.
    —-रवि श्रीवास्तव

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