रंगे हाथों पकड़े गये कर्मचारी को यूँ ही नौकरी से नहीं निकाला जा सकता

सिर्फ इस आधार पर कि कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हो गया है, विभाग बिना जांच किए उसे सेवामुक्त नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भले ही सरकारी कर्मचारी घूस लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा जाए लेकिन उसे हटाने की कार्रवाई उचित जांच के बाद ही की जा सकेगी। जस्टिस अल्तमस कबीर और सीरियक जोसफ की खंडपीठ ने यह फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज कर दी और 28 साल पूर्व बर्खास्त सहायक अभियंता का सेवामुक्ति आदेश रद्द कर दिया। सिंचाई विभाग में सहायक अभियंता रामविनय सिन्हा को 200 रुपये की घूस लेते हुए पकड़ा गया था जिसके बाद सरकार ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

घूस लेने की यह घटना 25 मई 1981 की है। दैनिक हिन्दुस्तान में श्याम सुमन की रिपोर्ट है कि सिन्हा की अपील पर उत्तर प्रदेश प्रशासनिक पंचाट ने बर्खास्तगी का आदेश पलट दिया और कहा कि सरकार ने आरोपी को बिना सुनवाई का मौका दिए सेवा से निकाला है जबकि संविधान के अनुच्छेद 311 (2) स्पष्ट कहा गया है कि सरकारी कर्मी को उचित जांच, चार्जशीट और अपील का मौका देकर ही सेवा से हटाया जा सकता है। सिन्हा के वकील आरके गुप्ता ने कहा कि इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे नहीं माना। उन्होंने कहा कि सरकार ने सिन्हा के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ इसलिए की कि उनके खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हो गया था।

साथ ही उन्होनें कहा कि यदि सरकार ने सिन्हा को हटाया था तो उनके कनिष्ठों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। साथ ही सिन्हा को हटाने का यह आदेश उसे पूरी जिंदगी के लिए दागी बना रहा है जो उचित नहीं है। इस मामले में सिन्हा को निवचली अदालत ने दो वर्ष की सजा दी है जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है।

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One thought on “रंगे हाथों पकड़े गये कर्मचारी को यूँ ही नौकरी से नहीं निकाला जा सकता”

  1. यह दुनिया फानी है जी, रंगे हाथों पकड़ा जाना भी फानी हो सकता है। इस लिए उसे नौकरी से हटाने या सजा देने के पहले उस की सुनवाई तो जरूरी है।

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