पुराने फैसले, नज़ीर बन सकते हैं

सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति एके गांगुली की पीठ ने, आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज करते हुए एक व्यवस्था दी है, जिसमें उसने उत्पाद शुल्क विभाग के एक निरीक्षक को भ्रष्टाचार के मामले में दोषमुक्त करार दिया था। व्यवस्था यह दी गयी है कि जब किसी मामले में तथ्य और परिस्थितियां एक समान हों तब उस हाल में उसके द्वारा पूर्व में दिए गए किसी निर्णय को नजीर माना जा सकता है। पीठ ने कहा कि किसी भी मामले में दिए गए निर्णय के आधार पर बिना बहस किए अदालतों को भविष्य में आंख मूंदकर फैसला नहीं देना चाहिए। फैसला देने से पहले इस बात की पुष्टि कर लेनी चाहिए कि वर्तमान मामले की परिस्थितियां उस मामले से मेल खा रही हैं कि नहीं जिस पर फैसला आधारित है।

न्यायमूर्ति पसायत ने पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए कहा कि हर एक मामला उसके तथ्यों पर आधारित होता है तथा एक मामले का दूसरे मामले से मेल खाना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि दोनों के बीच एक छोटी सी भिन्नता भी उसके फैसले को प्रभावित कर सकती है।

इस मामले में उत्पाद शुल्क विभाग के निरीक्षक एम. राधा कृष्णमूर्ति के खिलाफ चार हजार रुपये घूस लेने के आरोप में भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। निचली अदालत ने उसे दो वर्ष की कैद की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए उसे रिहा कर दिया था। सुप्रीमकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए कहा कि अदालतों के फैसलों को पत्थर की लकीर नहीं माना जाना चाहिए।
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