परिजनों के बीच सुलह होने के आधार पर भी बरी नहीं हो सकते

 सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि हत्या जैसे घृणित अपराधों की अदालतों द्वारा अनदेखी नहीं की जा सकती और आरोपी तथा मृतक के परिजनों के बीच मामले में सुलह होने के आधार पर भी बरी करने का आदेश पारित नहीं किया जा सकता। सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून और व्यवस्था का पालन राज्य का प्राथमिक दायित्व मानकर अनदेखी नहीं की जा सकती। विधि का शासन बनाए रखना राज्य का प्राथमिक दायित्व है। कुछ मामलों को छोड़ कर इस प्रकार के कानूनी उल्लंघनों को अदालत को अपराध को कम कर नहीं देखना चाहिए।

न्यायमूर्ति एस बी सिन्हा और न्यायमूर्ति मुकुंदम शर्मा की एक पीठ ने कहा कि यदि पक्ष विवादों पर सुलह कर लें, तो वे भविष्य में शांति से रह सकते हैं। लेकिन इसे बरी करने का आदेश पारित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। दोहरे हत्याकांड में आरोपी सतवीर सिंह और अन्य लोगों ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर बरी करने की अपील की थी, और उसके पीछे आधार दिया था कि उनकी संबंधित विरोधी पक्ष से सुलह हो गई। शीर्ष अदालत ने उनकी इसी याचिका को खारिज करते हुए अपना आदेश सुनाया। सिंह और उसके साथियों ने 27 नवंबर 1997 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में जगबंधन और रणधीर की घातक हथियारों से हत्या कर दी थी। आरोपी और मृतक दोनों का संबंध भूमि विवाद से था, जिसके बाद यह हत्या हुई थी।
सत्र न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा दी थी, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाद में बरकरार रखा था। इसके बाद मामले के लंबित रहने के दौरान संभवत: बदले की कार्रवाई में मृतक जगबंधन और रणधीर के हत्या से संबंधित पक्ष सुरेश चंद और अन्य ने आरोपी हरविन के भाई जगमेग की हत्या कर दी थी। स्थानीय ग्रामीणों की मध्यस्थता में जगमेग का परिवार सुरेश चंद और अन्य के खिलाफ सद्भावना के तौर पर और फिर से दुश्मनी रोकने के लिए गवाही न देने को राजी हो गए थे। इसके बाद सत्र न्यायालय ने सुरेश चंद और अन्य को बरी कर दिया था। इस सुलह का हवाला देते हुए सतवीर सिंह और अन्य ने अपनी माफी के लिए सुप्रीमकोर्ट की शरण ली, लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे खारिज कर दिया।
इस फैसले की प्रति यहाँ मौज़ूद है।
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One thought on “परिजनों के बीच सुलह होने के आधार पर भी बरी नहीं हो सकते”

  1. आप ने इस निर्णय का उल्लेख कर बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिला दिया है। हो यह रहा है कि एक मुकदमे के सजा काट रहे अपराधियों के रिश्तेदारों ने अपने बयान इस लिए बदल दिये कि वे छूट जाएँ। लेकिन अदालत ने राजीनामे के आधार पर उन्हें छोड़ देने से मंना कर दिया। लेकिन सच्चे बयान न देने के कारण उन के प्रतिपक्षी छूट गए। यह मामला पूरी विवेचना चाहता है।

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