ड्यूटी के दौरान काम के बोझ के कारण मौत नहीं, तो मुआवजा नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अगर किसी कर्मचारी की मौत ड्यूटी के दौरान नहीं होती, तो उसके परिजन को मुआवजा नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने यह व्यवस्था एक ट्रक ड्राइवर की मौत के मामले में दी। ड्राइवर की मौत आधिकारिक यात्रा के दौरान एक तालाब में नहाते समय डूबने से हो गई थी। जस्टिस अरिजीत पसायत और जस्टिस अशोक कुमार गांगुली की बेंच ने कहा कि दुर्घटना में मृत्यु हो सकती है लेकिन उसे साबित किया जाना जरूरी है। केवल नौकरी के दौरान मृत्यु होने को हादसा नहीं माना जा सकता। दूसरे शब्दों में, इसके लिए मृत्यु किसी दुर्घटना में होनी जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, कामगार मुआवजा अधिनियम के तहत मुआवजा पाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि मृत्यु काम करने के दौरान तनाव या काम के बोझ के कारण हुई है या तनाव और अधिक काम के बोझ के कारण चोटिल होने से हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रक के मालिक मल्लिकार्जुन जी. हीरेमथ की याचिका पर यह व्यवस्था दी। याचिका में उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा ट्रक ड्राइवर वीरेश कुमार की विधवा को मुआवजा देने के निर्देश को चुनौती दी थी।

ड्राइवर हीरेमथ के कहने पर गुरुगुंटा अमरेश्वर मंदिर के लिए कुछ सवारियों को ट्रक पर बैठा रखा था। ट्रक लेकर जब वह गुरुगुंटा पहुंचा तो वहां तालाब में स्नान करने गया जिसमें वह डूब गया। तब बेल्लारी के श्रमगार मुआवजा आयुक्त ने वर्ष 2002 के जुलाई माह में सूद समेत 2.20 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रक का मालिक विधवा को मुआवजा दे। सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश को रद्द कर दिया।

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One thought on “ड्यूटी के दौरान काम के बोझ के कारण मौत नहीं, तो मुआवजा नहीं”

  1. इस कानून में एक मुहावरा है, in the course of employement जिस की सही व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय ने की है। ड्राइवर की ड्यूटी स्नान करना नहीं अपितु उस दौरान वाहन को अपने संरक्षण में रखना था। लेकिन वह भी मौज मस्ती में सम्मिलित हो गया। या स्नान करने लगा जो पूरी तरह से वैयक्तिक काम है। उस दौरान हुई दुर्घटना में मृत्यु की जिम्मेदारी किसी तरह से भी नियोजक की नहीं हो सकती है।
    यह एक सही और दिशा निर्देशक निर्णय है।

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