पुनर्विवाह तक पति भी मुआवजे का हकदार

दिल्ली की एक अदालत ने निर्णय दिया है कि सड़क दुर्घटना में कामकाजी पत्नी की मौत के बाद उसका पति भी पुनर्विवाह तक मासिक मुआवजा पाने का हकदार होगा। एसके शर्मा की अध्यक्षता वाले मोटर दुर्घटना दावा प्राधिकरण के निर्णय के अनुसार पुरुष और महिला के लिए अलग-अलग कानून नहीं हो सकते हैं। किसी महिला के शिक्षित और स्वतंत्र रूप से कमाऊ होने या नहीं होने के मामले में विशेष कानून नहीं हो सकता। ऐसा नहीं कि वह हमेशा ही पुरुष पर निर्भर रहती है। 
अदालत ने ऐसा निर्णय दुर्घटना में अपनी पत्नी को खो चुके उस व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए दिया जिसमें उसने महिलाओं के पुनर्विवाह के बाद मासिक मुआवजे पर रोक के विपरीत उसे पुनर्विवाह के बाद भी मुआवजा दिए जाने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि पति की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद पत्नी के पुनर्विवाह के बाद मुआवजा रोकने वाला कानून पुरुषों पर लागू नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि चाहे पति की मौत हो या पत्नी की, मानव जीवन का नुकसान होता है। कानून की नजर में सब बराबर हैं। अदालत के अनुसार पुनर्विवाह के मामले में पुरुष और महिला दोनों की बात बराबर है।
अदालत ने पति या पत्नी की मौत के बाद पुनर्विवाह को सामान्य बताया। डीएमआरसी अधिकारी सुविंद्र कुमार सिंह ने 12 अक्टूबर 2006 को जम्मू में सड़क दुर्घटना में अपनी पत्नी की मौत और दुर्घटना में लगी चोट के बाद पर्याप्त और मासिक मुआवजे की मांग की थी। अदालत ने पीडि़त को दो हजार रुपये का मासिक भत्ता सहित 5.48 लाख रुपये मुआवजे का हकदार बताया था। इसके अलावा एक मोटरसाइकिल पर तीन लोगों के साथ सवारी करने पर पीडि़त को समान रूप से दोषी ठहराया। मुआवजे की राशि में 40 फीसदी की कटौती का निर्णय सुनाया था। अदालत ने दुर्घटना के लिए जिम्मेदार वाहन के मालिक को संयुक्त रूप से उत्तरदायी ठहराते हुए न्यू इंडिया इश्योरेंस को मुआवजा देने को कहा ।
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