गैरकानूनी हिरासत से मिला अपयश, मौत से बदतर: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी भी नागरिक का सबसे महत्वपूर्ण मूलभूत अधिकार है तथा गैरकानूनी हिरासत से उसे अपूरणीय क्षति और उसका अपमान होता है। न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर और मार्कण्डेय काटजू की खंडपीठ ने दीपक बजाज के खिलाफ मुम्बई पुलिस द्वारा विदेशी मुद्रा एवं तस्करी गतिविधि निरोधक कानून 1974 की धारा 3 एक के तहत जारी एहतियातन हिरासत आदेश को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

पीठ ने कहा, कोई व्यक्ति जिसके खिलाफ एहतियातन हिरासत आदेश पारित किया गया है, कोर्ट के समक्ष यह साबित कर सकता है कि उसके खिलाफ पारित आदेश गैरकानूनी है। उस व्यक्ति को जेल जाने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति काटजू ने अपने 28 पृष्ठ के आदेश में भगवत गीता की पंक्तियों का उल्लेख किया जिसमें कहा गया, किसी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए बिना किसी फैसले के किसी को जेल भेजने से मिला अपयश मौत से बदतर है।

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2 thoughts on “गैरकानूनी हिरासत से मिला अपयश, मौत से बदतर: सुप्रीम कोर्ट”

  1. चलिए बात कुछ वजनदार हुई।

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