हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीशों की तरह संरक्षण मिलेगा कि नहीं?

गाजियाबाद नजारत घोटाले में अभी तक 75 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हो चुका है। लेकिन अभी तक किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ न तो मामला दर्ज हुआ है और न ही किसी तरह की पूछताछ हुई है। अब सुप्रीमकोर्ट विचार करेगा कि मुंसिफ से लेकर जिला जज स्तर तक के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज करने और पूछताछ करने से पहले पुलिस को अनुमति लेनी जरूरी है कि नहीं। सेवारत व सेवानिवृत्त जजों को भी हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीशों की तरह संरक्षण मिलेगा कि नहीं।

न्यायमूर्ति बीएन अग्रवाल की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार, 1 अगस्त को मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे बार एसोसिएशन के वकील से कहा है कि वह बताएं कि अधीनस्थ अदालतों के मुंसिफ से लेकर जिला जज तक के न्यायिक अधिकारियों को हाईकोर्ट व सुप्रीमकोर्ट के जजों की तरह संरक्षण प्राप्त है कि नहीं। वीरास्वामी मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा पहले ही दी जा चुकी व्यवस्था के मुताबिक हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ पुलिस कोई मामला दर्ज नहीं कर सकती है और न ही उनसे कोई पूछताछ की जा सकती है। ऐसा करने से पहले पुलिस को मुख्य न्यायाधीश व राष्ट्रपति से अनुमति लेनी होगी। कोर्ट सेवानिवृत्त जजों के बारे में भी विचार करेगा।

सुनवाई के दौरान ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने कहा कि सीआरपीसी में मामले की जांच की व्यवस्था दी गई है। जब पुलिस किसी भी व्यक्ति से पूछताछ कर सकती है तो उसे जजों से भी बतौर गवाह पूछताछ की अनुमति मिलनी चाहिए। पीठ ने कहा कि जजों को सीधे तौर पर मामला दर्ज होने और पूछताछ से इसलिए छूट प्राप्त है ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रहे। यदि ऐसा नहीं होगा तो न्यायपालिका स्वतंत्र होकर फैसले नहीं सुना पाएगी। पीठ ने कहा कि वे 6 अगस्त को इस मामले पर विस्तृत सुनवाई करेंगे। यह भी विचार करेंगे कि उन्हें मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का अधिकार है कि नहीं।

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