बड़े-बड़े पूंजीपतियों की ओर से दायर 159 याचिकाएं खारिज: अरबों की बचत हुयी

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने प्रदेश सरकार के राजस्व संग्रह से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में प्रवेश कर की वसूली को संवैधानिक करार दिया है। देशभर के बड़े-बड़े पूंजीपतियों की ओर से दायर 159 याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को अरबों रुपए की चपत लगने से भी बचा दिया। मध्यप्रदेश स्थानीय क्षेत्र में प्रवेश पर कर अधिनियम 1976 की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए दो-चार नहीं, बल्कि कुल 160 याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गई थीं। जिनमें याचिकाकर्ताओं की ओर से देश की उच्चतम न्यायालय के अनेक नामवर वकीलों ने आकर तर्क प्रस्तुत किए तथा प्रवेश कर को असंवैधानिक बताया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह कर सुप्रीमकोर्ट द्वारा जिंदल स्टील विरुद्ध हरियाणा सरकार के आदेशों के विपरीत है और इसे संवैधानिक दायरे में नहीं रखा जा सकता है।

सुप्रीमकोर्ट के उक्त आदेश के हवाले के साथ ही अन्य तर्को की प्रस्तुति के साथ देश की लगभग 14 हाईकोर्ट ने प्रवेश कर को असंवैधानिक भी करार दिया है। लेकिन राज्य सरकार के महाधिवक्ता रविनन्दन सिंह तथा उप महाधिवक्ता विजय शुक्ला ने हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्रा तथा जस्टिस आर.एस. झा के समक्ष अनेक ठोस तत्वों की प्रस्तुति करते हुए प्रवेश कर को संवैधानिक ही बताने के प्रयास किए। सरकार की ओर से तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि प्रवेश कर खासतौर से मध्यप्रदेश में चुंगी कर के एवज में वसूला जा रहा है। इस कर की प्रतिवर्ष संग्रहित होने वाली राशि 850 करोड़ रुपए में से सिर्फ दो प्रतिशत कलेक्शन चार्ज की कटौती कर प्रदेश भर के स्थानीय निकायों को वितरित किया जाता है। नगर पंचायत से लेकर नगरनिगम तक के अधिकांश विकास कार्य इस राशि से ही कराए जाते है। सरकार की ओर से पिछले पांच वर्षो में वसूले गए कर तथा विकास कार्यो में उपयोग का विस्तृत ब्यौरा भी कोर्ट के समक्ष पेश किया गया। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की उक्त युगलपीठ ने फैसले को सुरक्षित रख लिया और १५ मई को खुली अदालत में उसे सुनाया।

हाईकोर्ट की युगलपीठ ने कहा कि सुप्रीमकोर्ट के जिस आदेश का हवाला देकर याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिकाएं पेश की है, वे राज्य सरकार द्वारा वसूले जाने वाले प्रवेश कर से मेल नहीं खाती है। राज्य सरकार द्वारा वसूले जाने वाला प्रवेश कर विकास से जुड़ा हुआ है और अति महत्वपूर्ण है तथा वह चुंगी कर समाप्त करने के बाद शुरू किया गया है। इसलिए इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता है। इस आदेश के साथ युगलपीठ ने एक साथ 159 याचिकाएं खारिज कर दी है। एक याचिका को अलग तरह की मानते हुए सुनवाई के लिए रखा है। प्रवेश कर संबंधी मामले में राज्य सरकार की जीत से उसे अरबों रुपए की चपत से बचत हो गई है। वरना न सिर्फ प्रतिवर्ष 850 करोड़ से अधिक का तो सीधा नुकसान होता ही, साथ ही अब तक वसूली गई राशि को भी वापिस करना पड़ता।

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